श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
त्वं न: सपत्नैरभवाय किं भृतो
यो मायया हन्त्यसुरान् परोक्षजित् ।
त्वां योगमायाबलमल्पपौरुषं
संस्थाप्य मूढ प्रमृजे सुहृच्छुच: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; न:—हम सबके; सपत्नै:—हमारे शत्रुओं के द्वारा; अभवाय—मारने के लिए; किम्—क्या ऐसा ही है; भृत:—पालित; य:—जो; मायया—छल से; हन्ति—मारता है; असुरान्—असुर को; परोक्ष-जित्—अदृश्य रहकर जीतने वाला; त्वाम्—तुमको; योगमाया-बलम्—जिसकी शक्ति मोहक शक्ति है; अल्प-पौरुषम्—कम शक्ति वाला; संस्थाप्य—मारकर; मूढ—मूर्ख; प्रमृजे—दूर कर दूँगा; सुहृत्-शुच:—अपने बन्धुओं का शोक ।.
 
अनुवाद
 
 अरे धूर्त, हमारे शत्रुओं ने हमारे वध के लिए तुम्हें पाला है और तुमने अदृश्य रहकर कुछ असुरों को मार दिया है। अरे मूर्ख! तुम्हारी शक्ति केवल योगमाया है, अत: आज मैं तुम्हें मारकर अपने बन्धुओं का शोक दूर कर दूँगा।
 
तात्पर्य
 असुर ने अभवाय शब्द का प्रयोग किया जिसका अर्थ, “मारने के लिए” है। श्रीधर स्वामी की टीका है कि इस ‘मारने’ का अर्थ मुक्ति दिलाना अर्थात् जन्म-मरण के प्रक्रम को मारना है। भगवान् जन्म-मरण के प्रक्रम को मारते हैं, किन्तु स्वयं अदृश्य बने रहते हैं। भगवान् की अन्त:शक्ति अचिन्त्य है, किन्तु इस शक्ति के नाममात्र के प्रदर्शन से भगवान् की कृपावश अज्ञान से उद्धार हो जाता है। शुच: का अर्थ है शोक या कष्ट। भगवान् अपनी योगमाया से इस भौतिक संसार के सारे दुखों को दूर कर सकते हैं। उपनिषदों (श्वेताश्वतर उपनिषद ६.८) में कहा गया है—परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते। भगवान् सामान्य मनुष्य को दृष्टिगोचर नहीं होते, किन्तु उनकी शक्तियाँ अनेक प्रकार से कार्यशील रहती हैं। जब असुर संकट में होते हैं, तो वे कहते हैं कि ईश्वर अपने को छिपा रहा है और योगशक्ति से काम कर रहा है। वे सोचते हैं कि यदि ईश्वर उन्हें मिल जाय तो वे उसे मात्र दृष्टिपात से मार डालें। हिरण्याक्ष यही सोचता था इसीलिए उसने भगवान् को ललकारा—“तुमने देवताओं का पक्ष लेकर हमारी जाति को महान् क्षति पहुँचाई है और तुमने अपने को सदा अदृश्य रखते हुए न जाने हमारे कितने ही बन्धु-बान्धवों का वध किया है। अब मैं तुम्हें अपने समक्ष पा गया हूँ, अत: मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं तुम्हारा वध करके अपने कुटुम्बियों को तुम्हारे योगिक कुकृत्यों से मुक्त करूँगा।”
असुर सदैव ईश्वर को न केवल वचन तथा विचार से मारने के लिए उत्सुक रहते हैं वरन् वे यह भी सोचते हैं कि यदि कोई भौतिक शक्ति एकत्र कर ले तो घातक भौतिक आयुधों से भी ईश्वर को मारा जा सकता है। कंस, रावण तथा हिरण्याक्ष जैसे असुर सदा अपने आपको इतना बलशाली मानते थे कि चाहें तो ईश्वर का वध कर दें। असुर यह नहीं समझ पाते कि ईश्वर अपनी बहुमुखी शक्तियों से इस विलक्षणता से कार्य कर सकते हैं कि वे अपने सनातन धाम गोलोक वृन्दावन में रहकर सर्वत्र उपस्थित रह सकते हैं।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥