श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
स तुद्यमानोऽरिदुरुक्ततोमरै-
र्दंष्ट्राग्रगां गामुपलक्ष्य भीताम् ।
तोदं मृषन्निरगादम्बुमध्याद्
ग्राहाहत: सकरेणुर्यथेभ: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; तुद्यमान:—सताया जाकर; अरि—शत्रु का; दुरुक्त—दुर्वचनों से; तोमरै:—आयुधों से; दंष्ट्र-अग्र—अपनी दाढ़ों के अग्र भाग पर; गाम्—स्थित; गाम्—पृथ्वी को; उपलक्ष्य—देखकर; भीताम्—भयभीत; तोदम्—पीड़ा; मृषन्—सहते हुए; निरगात्—बाहर निकल आया; अम्बु-मध्यात्—जल के भीतर से; ग्राह—घडिय़ाल से; आहत:— आक्रमण किया गया; स-करेणु:—हथिनी सहित; यथा—जिस प्रकार; इभ:—हाथी ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि भगवान् असुर के तीर सदृश बेधने वाले दुर्वचनों से अत्यन्त पीडि़त हुए थे, किन्तु उन्होंने इस पीड़ा को सह लिया। वे अपनी दाढ़ों के अग्रभाग पर स्थित पृथ्वी को भयभीत देखकर जल में से निकलकर उसी प्रकार बाहर आ गये जिस प्रकार घडिय़ाल द्वारा आक्रमण किये जाने पर हाथी अपनी सहचरी हथिनी के साथ बाहर आ जाता है।
 
तात्पर्य
 मायावादी दार्शनिक यह कभी नहीं समझेंगे कि भगवान् के भी संवेदनाएँ होती हैं। यदि कोई उनकी स्तुति करता है, तो भगवान् प्रसन्न होते हैं। इसी प्रकार यदि कोई उनके अस्तित्व को नकारता है या उन्हें गाली देता है, तो वे अप्रसन्न होते हैं। मायावादी दार्शनिक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की निन्दा करते हैं, अत: वे असुर तुल्य ही हैं। उनका कथन है कि ईश्वर के न कोई सिर है, न आकार है, न पाँव, न हाथ तथा न कोई अन्य शारिरिक अंग है। दूसरे शब्दों में, वे यह कहते हैं कि ईश्वर मृत या पंगु है। परमेश्वर के सम्बन्ध में ऐसी भ्रान्त धारणाएँ उनके असंतुष्ट होने के कारण हैं। वे कभी भी ऐसे निराकार वर्णनों से संतुष्ट नहीं होते। यहाँ पर, यद्यपि भगवान् को असुर के मर्मभेदी शब्दों से पीड़ा हो रही थी, किन्तु उन्होंने अपने परम भक्त देवताओं के सन्तोष के लिए पृथ्वी का उद्धार किया। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर हमारे ही समान संवेदनशील हैं। वे हमारी प्रार्थनाओं से प्रसन्न होते हैं और उनके प्रति दुर्वचनों से अप्रसन्न। वे अपने भक्तों को संरक्षण प्रदान करने के लिए नास्तिकों के दुर्वचन सहने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥