श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
स गामुदस्तात्सलिलस्य गोचरे
विन्यस्य तस्यामदधात्स्वसत्त्वम् ।
अभिष्टुतो विश्वसृजा प्रसूनै-
रापूर्यमाणो विबुधै: पश्यतोऽरे: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (भगवान्); गाम्—पृथ्वी को; उदस्तात्—सतह पर; सलिलस्य—जल की; गोचरे—अपनी दृष्टि के अन्तर्गत; विन्यस्य—रखकर; तस्याम्—पृथ्वी को; अदधात्—सञ्चार किया; स्व—अपना, निज; सत्त्वम्—अस्तित्व; अभिष्टुत:—प्रशंसा की; विश्व-सृजा—ब्रह्मा (ब्रह्माण्ड के सृष्टा) द्वारा; प्रसूनै:—फूलों से; आपूर्यमाण:—प्रसन्न होकर; विबुधै:—देवताओं द्वारा; पश्यत:—देखते हुए; अरे:—शत्रु के ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने पृथ्वी को लाकर जल की सतह पर अपनी दृष्टि के सामने रख छोड़ा और अपनी निजी शक्ति को उसमें स्थानान्तरित कर दिया जिससे वह जल पर तैरती रहे। शत्रु के देखते-देखते, ब्रह्माण्ड के स्रष्टा ब्रह्माजी ने उनकी स्तुति की और अन्य देवताओं ने उन पर फूलों की वर्षा की।
 
तात्पर्य
 असुर लोग यह कभी नहीं समझ पाएंगे कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने जल पर पृथ्वी को किस प्रकार तैरा दिया, किन्तु भक्तों के लिए भगवान् का यह कृत्य तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है। न केवल पृथ्वी, वरन् न जाने कितने लाखों-करोड़ों लोक, वायु में तैर रहे हैं, उन्हें तैरने की यह शक्ति ईश्वर ने प्रदान की है; इसकी कोई अन्य व्याख्या नहीं है। भौतिकतावादी यह व्याख्या कर सकते हैं कि सभी लोक गुरुत्वाकर्षण के नियमानुसार तैर रहे हैं, किन्तु यह आकर्षण-नियम परमेश्वर के ही नियन्त्रण पर कार्यशील होता है। भगवद्गीता का भी यही कथन है, जिसमें भगवान् के वचन द्वारा पुष्टि की गई है कि चाहे भौतिक नियम हों या प्राकृतिक, अथवा समस्त लोकों की वृद्धि, पालन, उत्पत्ति हो, इन सबके पीछे भगवान् का हाथ है। भगवान् के कार्यकलापों को ब्रह्मा आदि देवता ही समझ सकते हैं, अत: जब उन्होंने भगवान् के असाधारण शौर्य को देखा जिससे वे पृथ्वी को जल की सतह पर रख सके थे तो उन्होंने भगवान् के इस दिव्य कृत्य के लिए उन पर फूलों की बौछार कर दी।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥