श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
अवधार्य विरिञ्चस्य निर्व्यलीकामृतं वच: ।
प्रहस्य प्रेमगर्भेण तदपाङ्गेन सोऽग्रहीत् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; अवधार्य—सुनकर; विरिञ्चस्य—ब्रह्माजी का; निर्व्यलीक—समस्त पापों से मुक्त; अमृतम्—अमृतमय; वच:—शब्द; प्रहस्य—खूब हँसकर; प्रेम-गर्भेण—प्रेम से पूरित; तत्—वे शब्द; अपाङ्गेन— चितवन से; स:—श्रीभगवान् ने; अग्रहीत्—स्वीकार किया ।.
 
अनुवाद
 
 श्री मैत्रेय ने कहा—स्रष्टा ब्रह्मा के निष्पाप, निष्कपट तथा अमृत के समान मधुर वचनों को सुनकर भगवान् जीभरकर हँसे और उन्होंने प्रेमपूर्ण चितवन के साथ उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
 
तात्पर्य
 निर्व्यलीक शब्द अत्यन्त सार्थक है। देवताओं अथवा भक्तों की प्रार्थनाएँ निष्कपट होती हैं, किन्तु असुरों की प्रार्थनाएँ सदा कपटपूर्ण होती हैं। ब्रह्मा से वर प्राप्त करके हिरण्याक्ष अत्यन्त शक्तिशाली बना, किन्तु वर प्राप्त करने के बाद अपने पापपूर्ण मनोभावों के कारण उसने उत्पात प्रारम्भ कर दिया। ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं द्वारा की गई प्रार्थनाओं की तुलना असुरों की प्रार्थनाओं से नहीं करनी चाहिए। देवों का अभिप्राय भगवान् को प्रसन्न करना था, अत: भगवान् हँस पड़े और असुर को मारने की उनकी प्रार्थना उन्होंने स्वीकार कर ली। असुर कभी भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की प्रशंसा नहीं करना चाहते, क्योंकि उनको इनका पता भी नहीं हैं, अत: वे देवताओं के पास ही जाते हैं। भगवद्गीता में इस कृत्य की निन्दा की गई है। जो लोग देवताओं के पास जाकर पापपूर्ण कृत्यों में उन्नति के लिए प्रार्थना करते हैं, वे बुद्धि से विहीन माने गये हैं। असुरों की बुद्धि इसीलिए मारी जाती है, क्योंकि उन्हें इसका पता नहीं रहता कि उनका हित वास्तव में किसमें है। यदि उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की जानकारी होती भी है, तो वे उनके पास नहीं जाते, वे श्रीभगवान् से मनोवांछित वर प्राप्त भी नहीं कर सकते, क्योंकि उनके उद्देश्य सदा पापपूर्ण रहते हैं। कहा जाता है कि बंगाल में डाकू अन्यों की सम्पत्ति लूटने की अपनी पापपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए देवी काली की पूजा करते थे, किन्तु वे विष्णु मन्दिर में कभी नहीं जाते थे, क्योंकि विष्णु की प्रार्थना करने से उनके मनोरथ पूरे न हो पाते। अत: श्रीभगवान् के भक्तों या देवताओं की प्रार्थनाएँ सदैव निष्कपट होती हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥