श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
स्वपौरुषे प्रतिहते हतमानो महासुर: ।
नैच्छद्गदां दीयमानां हरिणा विगतप्रभ: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-पौरुषे—अपना पौरुष या उद्यम; प्रतिहते—व्यर्थ हुआ; हत—विनष्ट किया; मान:—गर्व; महा-असुर:—महान् असुर ने; न ऐच्छत्—(लेने की) इच्छा न की; गदाम्—गदा; दीयमानाम्—देने पर; हरिणा—हरि के द्वारा; विगत प्रभ:—तेज घटने से ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार अपने पुरुषार्थ को व्यर्थ हुआ देखकर, वह महान् असुर अत्यन्त लज्जित हुआ और उसका तेज जाता रहा। अब वह श्रीभगवान् द्वारा लौटा दी जाने वाली गदा को ग्रहण करने में संकोच कर रहा था।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥