श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 13

 
श्लोक
जग्राह त्रिशिखं शूलं ज्वलज्ज्वलनलोलुपम् ।
यज्ञाय धृतरूपाय विप्रायाभिचरन् यथा ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
जग्राह—उठाया; त्रि-शिखम्—तीन नोकों वाला; शूलम्—त्रिशूल; ज्वलत्—जलती हुई; ज्वलन—अग्नि; लोलुपम्—लपलपाता; यज्ञाय—समस्त यज्ञों के भोक्ता; धृत-रूपाय—वराह रूप में; विप्राय—ब्राह्मण को; अभिचरन्—दुष्टतावश प्रयोग करके; यथा—जिस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 अब उसने प्रज्जवलित अग्नि के समान लपलपाता त्रिशूल निकाला और समस्त यज्ञों के भोक्ता भगवान् पर फेंका, जिस प्रकार कोई व्यक्ति किसी पवित्र ब्राह्मण पर दुर्भावनावश अपनी तपस्या का प्रयोग करे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥