श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
वृक्णे स्वशूले बहुधारिणा हरे:
प्रत्येत्य विस्तीर्णमुरो विभूतिमत् ।
प्रवृद्धरोष: स कठोरमुष्टिना
नदन् प्रहृत्यान्तरधीयतासुर: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
वृक्णे—कटने पर; स्व-शूले—अपना त्रिशूल; बहुधा—अनेक खण्डों में; अरिणा—सुदर्शन चक्र द्वारा; हरे:— श्रीभगवान् की; प्रत्येत्य—ओर बढक़र; विस्तीर्णम्—चौड़ा; उर:—वक्षस्थल; विभूति-मत्—धन की देवी का आवास; प्रवृद्ध—बढ़ा हुआ; रोष:—क्रोध; स:—हिरण्याक्ष; कठोर—कठोर; मुष्टिना—अपनी मुट्ठी से; नदन्— गर्जना करते; प्रहृत्य—प्रहार करके; अन्तरधीयत—अन्तर्धान हो गया; असुर:—असुर ।.
 
अनुवाद
 
 जब श्रीभगवान् के चक्र से उसका त्रिशूल खण्ड खण्ड हो गया तो असुर अत्यन्त क्रोधित हुआ। अत: वह भगवान् की ओर लपका और तेज गर्जना करते हुए उनके चौेड़े वक्षस्थल पर, जिस पर श्रीवत्स का चिह्न था, अपनी कठोर मुष्टिका से प्रहार किया। फिर वह अदृश्य हो गया।
 
तात्पर्य
 श्रीवत्स श्वेत बालों की भौंरी है, जो भगवान् के वक्षस्थल पर है और उनके श्रीभगवान् होने का विशिष्ट चिह्न है। वैकुण्ठ लोक अथवा गोलोक वृन्दावन के सभी निवासी श्रीभगवान् की ही समरूप होते हैं अत: इसी श्रीवत्स चिह्न के द्वारा भगवान् को अन्यों के बीच पहचाना जाता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥