श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
तेनेत्थमाहत: क्षत्तर्भगवानादिसूकर: ।
नाकम्पत मनाक् क्‍वापि स्रजा हत इव द्विप: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
तेन—हिरण्याक्ष द्वारा; इत्थम्—इस प्रकार; आहत:—प्रहार किया गया; क्षत्त:—हे विदुर; भगवान्—श्रीभगवान्; आदि-सूकर:—प्रथम शूकर; न अकम्पत—हिला-डुला नहीं; मनाक्—तनिक भी; क्व अपि—कहीं भी; स्रजा— पुष्प की माला से; हत:—मारा गया; इव—सदृश; द्विप:—हाथी ।.
 
अनुवाद
 
 हे विदुर, असुर द्वारा इस प्रकार प्रहार किये जाने पर आदि वराह रूप भगवान् के शरीर का कोई अंग तनिक भी हिला-ड़ुला नहीं मानो किसी हाथी पर फूलों की माला से प्रहार किया गया हो।
 
तात्पर्य
 जैसाकि बताया जा चुका है यह असुर पहले वैकुण्ठलोक में भगवान् का पार्षद था, किन्तु किसी कारणवश वह असुर बन गया। वह अपनी मुक्ति के लिए भगवान् से युद्ध कर रहा था। भगवान् को अपने दिव्य शरीर में उसके द्वारा किया गया प्रहार वैसा ही आनन्द दे रहा था जिस प्रकार प्रौढ़ पिता से छोटा शिशु लड़े। कभी-कभी बाप और बेटे में बनावटी युद्ध होता है, तो बाप को आनन्द मिलता है। उसी प्रकार भगवान् को हिरण्याक्ष द्वारा किया गया प्रहार पूजा में चढ़ाये गये फूलों के समान प्रतीत हुआ। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि भगवान् अपना दिव्य आनन्द लेने के लिए लडऩा चाहते थे इसीलिए उन्हें इस आक्रमण से सुख मिल रहा था।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥