श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
अथोरुधासृजन्मायां योगमायेश्वरे हरौ ।
यां विलोक्य प्रजास्त्रस्ता मेनिरेऽस्योपसंयमम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तब; उरुधा—अनेक प्रकार से; असृजत्—चलाईं; मायाम्—कपटपूर्ण चालें; योग-माया-ईश्वरे—योगमाया के ईश्वर; हरौ—हरि पर; याम्—जिसको; विलोक्य—देखकर; प्रजा:—लोग; त्रस्ता:—भयभीत; मेनिरे—सोचा; अस्य—इस ब्रह्माण्ड का; उपसंयमम्—संहार, प्रलय ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु असुर ने योगेश्वर श्रीभगवान् पर अनेक कपटपूर्ण चालों का प्रयोग किया। यह देखकर सभी लोग भयभीत हो उठे और सोचने लगे कि ब्रह्माण्ड का संहार निकट है।
 
तात्पर्य
 भगवान् तथा उनके भक्त का, जो असुर रूप में परिणत हो गया था, यह युद्ध इतना भीषण प्रतीत होने लगा मानो ब्रह्माण्ड में प्रलय होने वाली है। यह पूर्ण
पुरुषोत्तम भगवान् की महानता है। उनकी एक उँगली का उठना ही ब्रह्माण्ड के वासियों की दृष्टि में अत्यन्त अनिष्टकारी माना जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥