श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
प्रववुर्वायवश्चण्डास्तम: पांसवमैरयन् ।
दिग्भ्यो निपेतुर्ग्रावाण: क्षेपणै: प्रहिता इव ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
प्रववु:—बह रही थी; वायव:—हवाएँ; चण्डा:—भयानक; तम:—अन्धकार; पांसवम्—धूल से उत्पन्न; ऐरयन्— फैल रहे थे; दिग्भ्य:—सभी दिशाओं से; निपेतु:—गिरे; ग्रावाण:—पत्थर; क्षेपणै:—मशीनगनों से; प्रहिता:—फेंके गये; इव—मानो ।.
 
अनुवाद
 
 सभी दिशाओं से प्रचण्ड वायु बहने लगी और धूल तथा उपलवृष्टि से अन्धकार फैल गया, प्रत्येक दिशा से पत्थर गिरने लगे मानो वे मशीनगनों द्वारा फेंके जा रहे हों।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥