श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
द्यौर्नष्टभगणाभ्रौघै: सविद्युत्स्तनयित्नुभि: ।
वर्षद्‌भि: पूयकेशासृग्विण्मूत्रास्थीनि चासकृत् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
द्यौ:—आकाश; नष्ट—विलुप्त; भ-गण—नक्षत्र गण; अभ्र—बादलों के; ओघै:—समूहों से; स—सहित; विद्युत्— बिजली; स्तनयित्नुभि:—तथा कडक़ (गर्जना) से; वर्षद्भि:—बरसने से; पूय—पीब; केश—बाल; असृक्—रक्त; विट्—विष्ठा; मूत्र—मूत्र; अस्थीनि—हड्डियाँ; च—यथा; असकृत्—पुन:पुन: ।.
 
अनुवाद
 
 बिजली तथा गर्जना से युक्त आकाश में बादलों के समूह घिर आने से नक्षत्रगण विलुप्त हो गए। आकाश से पीब, बाल, रक्त, मल, मूत्र तथा हड्डियों की वर्षा होने लगी।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥