श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 24

 
श्लोक
विनष्टासु स्वमायासु भूयश्चाव्रज्य केशवम् ।
रुषोपगूहमानोऽमुं दद‍ृशेऽवस्थितं बहि: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
विनष्टासु—दूर हो जाने पर; स्व-मायासु—अपनी माया शक्ति; भूय:—पुन:; च—यथा; आव्रज्य—सामने आकर; केशवम्—श्रीभगवान् को; रुषा—क्रोध से पूर्ण; उपगूहमान:—आलिंगन करते; अमुम्—भगवान् को; ददृशे—देखा; अवस्थितम्—खड़े हुए; बहि:—बाहर ।.
 
अनुवाद
 
 जब असुर ने देखा कि उसकी मायाशक्ति विलुप्त हो गई है, तो वह एक बार फिर श्रीभगवान् केशव के सामने आया और उन्हें रौंद देने की इच्छा से तमतमाते हुए अपने बाहुओं में भर कर उनको जकड़ लेना चाहा। किन्तु उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उसने भगवान् को अपने बाहु-पाश से बाहर खड़े देखा।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में भगवान् को केशव कहा गया हैं क्योंकि उन्होंने सृष्टि के प्रारम्भ में केशी असुर का वध किया था। कृष्ण का नाम केशव भी है। श्रीकृष्ण समस्त अवतारों के मूल हैं और ब्रह्म-संहिता में इसकी पुष्टि हुई है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द समस्त कारणों के कारण हैं और वे एकसाथ ही विभिन्न अवतारों तथा अंशों में विद्यमान रहने वाले हैं। असुर हमेशा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आँकने का प्रयत्न करता रहता है। यह सोचकर कि वह अपनी भौतिक शक्ति से अपनी सीमित बाहों के भीतर भगवान् को जकड़ सकेगा, उसने अपनी बाहों में उन्हें भरना चाहा। उसे यह ज्ञात न था कि भगवान् महान् से महानतम और सूक्ष्म से सूक्ष्मतम हैं। कोई भी व्यक्ति न तो उन्हें बन्दी बना सकता हैं और
न अपने वश में रख सकता है। किन्तु आसुरी व्यक्ति सदैव भगवान् की लम्बाई चौड़ाई मापने का प्रयास करता रहता है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्ति से विराट रूप धारण कर सकते हैं और साथ ही साथ अपने भक्तों के पूज्य विग्रह के रूप में उनके डिब्बे में बन्द हो सकते हैं। ऐसे अनेक भक्त हैं, जो भगवान् की मूर्ति को छोटे से डिब्बे में रखते हैं और जहाँ भी जाते हैं उसे अपने साथ ले जाते हैं और प्रतिदिन प्रात: काल वे डिब्बे में रखे भगवान की पूजा करते हैं। श्रीभगवान् केशव या श्रीकृष्ण हमारी गणना की किसी माप से बँधे हुए नहीं हैं। वे अपने भक्त के साथ किसी भी उपयुक्त रूप में रह सकते हैं किन्तु आसुरी क्रिया-कलापों द्वारा उनको पा सकना कठिन है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥