श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
स आहतो विश्वजिता ह्यवज्ञया
परिभ्रमद्गात्र उदस्तलोचन: ।
विशीर्णबाह्वङ्‌घ्रिशिरोरुहोऽपतद्
यथा नगेन्द्रो लुलितो नभस्वता ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; आहत:—चोट खाकर; विश्व-जिता—श्रीभगवान् द्वारा; हि—यद्यपि; अवज्ञया—उपेक्षापूर्वक; परिभ्रमत्— चकराकर; गात्र:—शरीर; उदस्त—बाहर निकली; लोचन:—आँखें; विशीर्ण—छिन्न-भिन्न; बाहु—भुजाएँ; अङ्घ्रि—पाँव; शिर:-रुह:—बाल; अपतत्—गिर पड़ा; यथा—जैसे; नग-इन्द्र:—विशाल वृक्ष; लुलित:—उखड़ा हुआ; नभस्वता—आँधी से ।.
 
अनुवाद
 
 सर्वजेता भगवान् ने यद्यपि अत्यन्त उपेक्षापूर्वक प्रहार किया था, किन्तु उससे असुर का शरीर चकराने लगा। उसकी आँखे बाहर निकल आईं। उसके हाथ तथा पैर टूट गये, सिर के बाल बिखर गये और वह अंधड़ से उखड़े हुए विशाल वृक्ष की भाँति मृत होकर गिर पड़ा।
 
तात्पर्य
 भगवान् को किसी भी बलवान असुरों के (हिराण्याक्ष समेत) मारने में एक क्षण भी नहीं लगता। वे चाहते तो हिरण्याक्ष को बहुत पहले मार ड़ालते, किन्तु वे उस असुर को अपना पूरा मायाजाल दिखाने के लिए छोड़े रहे। मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि कोई इन्द्रजाल से, ज्ञान की वैज्ञानिक प्रगति से अथवा भौतिक शक्ति से भगवान् की समता नहीं कर सकता। उनके एक संकेत से हमारे सारे प्रयास निष्फल हो सकते हैं। उनकी शक्ति जो कि अनुमान के परे है जैसाकि यहाँ दिखाया गया है, इतनी प्रबल है कि समस्त आसुरी चालों के बावजूद भगवान् की इच्छा होते ही एक ही चाँटे से उस असुर की मृत्यु हो गई।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥