श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.19.27 
क्षितौ शयानं तमकुण्ठवर्चसं
करालदंष्ट्रं परिदष्टदच्छदम् ।
अजादयो वीक्ष्य शशंसुरागता
अहो इमां को नु लभेत संस्थितिम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
क्षितौ—पृथ्वी पर; शयानम्—लेटे हुए; तम्—हिरण्याक्ष को; अकुण्ठ—अमलिन; वर्चसम्—तेज; कराल—भयावने; दंष्ट्रम्—दाँत; परिदष्ट—काटे हुए; दत्-छदम्—ओंठ; अज-आदय:—ब्रह्मा इत्यादि ने; वीक्ष्य—देखकर; शशंसु:— प्रशंसा में कहा; आगता:—आये हुए; अहो—ओह; इमम्—यह; क:—कौन; नु—निस्सन्देह; लभेत—प्राप्त कर सकता है; संस्थितिम्—मृत्यु ।.
 
अनुवाद
 
 उस स्थान भूमि पर लेटे भयावने दाँतों वाले तथा अपने होंठों को काटते हुए उस असुर को देखने के लिए ब्रह्मा तथा अन्य देवता आ गये। उसके मुखमण्डल का तेज अब भी अमलिन था। ब्रह्मा ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, ओह! ऐसी भाग्यशाली मृत्यु किसकी हो सकती है?
 
तात्पर्य
 यद्यपि असुर मर चुका था, किन्तु उसके शरीर का तेज कम नहीं हुआ था। यह अत्यन्त विलक्षण है, क्योंकि जब कोई मनुष्य या पशु मरता है, तो उसका शरीर तुरन्त पीला पड़ जाता है, धीरे-धीरे तेज घट जाता है और सडऩ होने लगती है। किन्तु यहाँ यद्यपि हिरण्याक्ष मर चुका था, किन्तु उसके शरीर का तेज घटा नहीं था क्योंकि भगवान् ने उसके शरीर का स्पर्श किया था। शरीर का तेज तभी तक बना रहता है जब तक आत्मा उपस्थित रहता है। यद्यपि असुर के शरीर से आत्मा प्रयाण कर चुका था, किन्तु भगवान् द्वारा शरीर स्पर्श किये जाने से उसका तेज कम नहीं हुआ। व्यष्टि आत्मा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से भिन्न है। यदि कोई अपना शरीर छोड़ते समय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को देखता है, तो निश्चय ही वह भाग्यशाली है, अत: ब्रह्मा आदि देवों ने उस असुर की मृत्यु की प्रशंसा की।
 
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