श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
सा हता तेन गदया विहता भगवत्करात् ।
विघूर्णितापतद्रेजे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
सा—वह गदा; हता—प्रहार की गई; तेन—हिरण्याक्ष द्वारा; गदया—उसकी गदा से; विहता—छुट गयी; भगवत्— श्रीभगवान् के; करात्—हाथ से; विघूर्णिता—घूमती हुई; अपतत्—गिर पड़ी; रेजे—चमक रही थी; तत्—वह; अद्भुतम्—विचित्र; इव—निस्सन्देह; अभवत्—था ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु असुर की गदा से टकराकर भगवान् की गदा उनके हाथ से छिटक गई और घूमती हुई जब वह नीचे गिरी तो अत्यन्त मनोरम लग रही थी। यह अद्भुत दृश्य था, क्योंकि गदा विचित्र ढंग से प्रकाशमान थी।
 
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥