श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
देवा ऊचु:
नमो नमस्तेऽखिलयज्ञतन्तवे
स्थितौ गृहीतामलसत्त्वमूर्तये ।
दिष्टय‍ा हतोऽयं जगतामरुन्तुद-
स्त्वत्पादभक्त्या वयमीश निर्वृता: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
देवा:—देवताओं ने; ऊचु:—कहा; नम:—नमस्कार; नम:—नमस्कार; ते—तुमको; अखिल-यज्ञ-तन्तवे—समस्त यज्ञों के भोक्ता; स्थितौ—स्थिति को बनाए रखने के निमित्त; गृहीत—धारण किया; अमल—शुद्ध; सत्त्व—अच्छाई; मूर्तये—रूप; दिष्ट्या—सौभाग्यवश; हत:—मारा गया; अयम्—यह; जगताम्—लोकों को; अरुन्तुद:—कष्ट देने वाला; त्वत्-पाद—आपके चरण की; भक्त्या—भक्ति से; वयम्—हमने; ईश—हे भगवान्; निर्वृता:—सुख प्राप्त किया है ।.
 
अनुवाद
 
 देवताओं ने भगवान् को सम्बोधित करते हुए कहा—हम आपको नमस्कार करते हैं। आप समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं और आपने शुद्ध सात्विक भाव में विश्व की स्थिति बनाये रखने के लिए वराह रूप धारण किया है। यह हमारा सौभाग्य है कि समस्त लोकों को कष्ट देने वाला असुर आपके हाथों मारा गया और हे भगवान्, अब हम आपके चरण- कमलों की भक्ति करने के लिए स्वतन्त्र हैं।
 
तात्पर्य
 यह संसार तीन गुणों—सत्त्व, रज तथा तमोगुण—वाला है, किन्तु आध्यात्मिक जगत तो शुद्ध सत्त्व है। यहाँ यह बताया गया है कि भगवान् का रूप शुद्ध सत्त्व है, जिसका अर्थ है कि वह भौतिक नहीं है। इस भौतिक जगत में कहीं भी शुद्ध सत्त्व नहीं है। भागवत में शुद्ध सत्त्व अवस्था को सत्त्वं विशुद्धम् कहा गया है। विशुद्धम् का अर्थ है शुद्ध। शुद्ध सत्त्व में अन्य दो निम्न गुणों अर्थात् रजो तथा तमो गुणों के कारण कोई कल्मष नहीं होता है। अत: वराह रूप, जिसमें भगवान् प्रकट हुए थे, इस भौतिक जगत का न था। भगवान् के और भी कई रूप हैं, किन्तु इनमें से एक का भी सांसारिक गुणों से कोई सम्बन्ध नहीं रहता। ये रूप विष्णुरूप से अभिन्न हैं और विष्णु समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं।

वेदों में जिन यज्ञों की अनुशंसा की गई है वे सभी श्रीभगवान् को प्रसन्न करने के लिए हैं। तमोगुणी होने पर ही मनुष्य अन्य बिचौलियों (दूतों) को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु जीवन का वास्तविक ध्येय परम पुरुष, भगवान् विष्णु को प्रसन्न करना है। यही नहीं, सभी यज्ञों का उद्देश्य भी भगवान् को प्रसन्न करना है। जो जीवात्मा इसे भलीभाँति समझते हैं, वे देवता, दैवी या देव-तुल्य माने जाते हैं। चूँकि प्रत्येक जीवात्मा परमेश्वर का ही अंश है, अत: यह उसका धर्म है कि भगवान् की सेवा करे और उन्हें प्रसन्न रखे। सभी देवता श्रीभगवान् के प्रति आसक्त होते हैं। उन्हीं की प्रसन्नता के लिए विश्व भर को कष्ट प्रदान करने वाले असुर का भगवान् ने वध किया। पवित्र जीवन की सार्थकता भगवान् को प्रसन्न करने में है और पवित्र जीवन में जितने भी यज्ञ सम्पन्न किये जाते हैं, वे कृष्णभावनामृत कहलाते हैं। यह कृष्णभावनामृत भक्तियोग के द्वारा विकसित किया जाता है, जिसका यहाँ स्पष्ट उल्लेख हुआ है।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥