श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
मया यथानूक्तमवादि ते हरे:
कृतावतारस्य सुमित्र चेष्टितम् ।
यथा हिरण्याक्ष उदारविक्रमो
महामृधे क्रीडनवन्निराकृत: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
मया—मेरे द्वारा; यथा—जिस रूप में; अनूक्तम्—कहा गया; अवादि—व्याख्या की गई; ते—तुमको; हरे:— श्रीभगवान् का; कृत-अवतारस्य—जिसने अवतार लिया; सुमित्र—हे विदुर; चेष्टितम्—कार्यकलाप; यथा—जिस प्रकार; हिरण्याक्ष:—हिरण्याक्ष; उदार—अत्यन्त विस्तृत; विक्रम:—शौर्य; महा-मृधे—महान् युद्ध में; क्रीडन-वत्— खिलौन की तरह; निराकृत:—मारा गया ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने आगे कहा—हे विदुर, मैंने तुम्हें कह सुनाया कि भगवान् किस प्रकार प्रथम शूकर के रूप में अवतरित हुए और अद्वितीय शौर्य वाले असुर को महान् युद्ध में मार डाला मानो वह कोई खिलौना रहा हो। मैंने अपने पूर्ववर्ती गुरु से इसे जिस रूप में सुना था, वह तुम्हें सुना दिया।
 
तात्पर्य
 यहाँ मैत्रेय मुनि स्वीकार करते हैं कि उन्होंने भगवान् द्वारा हिरण्याक्ष वध को ज्यों का त्यों आख्यान के रूप में कह सुनाया है; उन्होंने अपनी ओर से उसमें कुछ नहीं जोड़ा, वरन् जिस रूप में अपने गुरु से सुना था उसी को कह सुनाया। इस प्रकार उन्होंने परम्परा प्रणाली को प्रामाणिक माना है। जब तक इस प्रकार गुरु से प्रामाणिक विधि से सुना न जाय, किसी आचार्य का कथन वैध नहीं हो सकता।

यहां यह भी कहा गया है कि यद्यपि असुर हिरण्याक्ष का शौर्य असीम था, किन्तु भगवान् के लिए वह खिलौना मात्र था। बालक बिना किसी प्रयास के अनेक खिलौने तोड़ देता है उसी प्रकार संसारी मनुष्यों की दृष्टि में भले ही कोई असुर कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, भगवान् को ऐसे असुर के मारने में कोई कठिनाई नहीं होती। वे लाखों असुरों का वैसे ही वध कर सकते हैं जिस प्रकार बालक अनेक खिलौनों से खेलकर उन्हें तोड़ डालता है।

 
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