श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
यो गजेन्द्र झषग्रस्तं ध्यायन्तं
चरणाम्बुजम् । क्रोशन्तीनां करेणूनां कृच्छ्रतोऽमोचयद् द्रुतम् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; गज-इन्द्रम्—हाथियों के राजा को; झष—मकर, घडिय़ाल द्वारा; ग्रस्तम्—आक्रमण किया गया; ध्यायन्तम्—ध्यान करते हुए; चरण—पाँव; अम्बुजम्—कमल; क्रोशन्तीनाम्—विलाप करती हुई; करेणूनाम्— हथिनियों को; कृच्छ्रत:—संकट से; अमोचयत्—उबारा; द्रुतम्—शीघ्र ।.
 
अनुवाद
 
 वह गजराज जिस पर मगरमच्छ ने आक्रमण कर दिया था और जिसने तब भगवान् के चरणकमलों का ध्यान किया, उसे भगवान ने तुरंत उबार किया। उस समय उसके साथ की हथिनियाँ चिंघाड़ रही थीं, किन्तु भगवान् ने आसन्न संकट से उनको बचा लिया।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर संकटग्रस्त हाथी, जिसकी रक्षा भगवान् ने की थी, उस का उदाहरण यहाँ विशेष रूप से दिया गया है, क्योंकि पशु भी भक्ति में भगवान् के पास याचना कर सकता है, जबकि देवता भी यदि भक्त नहीं है, तो उनके पास नहीं पहुँच सकता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥