श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
तं
सुखाराध्यमृजुभिरनन्यशरणैर्नृभि: ।
कृतज्ञ: को न सेवेत
दुराराध्यमसाधुभि: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको; सुख—सरलतापूर्वक; आराध्यम्—पूजनीय; ऋजुभि:—सरल लोगों द्वारा; अनन्य—अन्य कोई नहीं; शरणै:—शरणागत; नृभि:—मनुष्यों के द्वारा; कृत-ज्ञ:—उपकार मानने वाला; क:—क्या; न—नहीं; सेवेत—सेवा करनी चाहिए; दुराराध्यम्—पूजा कर पाना दुष्कर; असाधुभि:—अभक्तों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा कौन कृतज्ञ जीव होगा जो श्रीभगवान् जैसे परम स्वामी की प्रेमाभक्ति नहीं करना चाहेगा? वे विमल भक्तों पर, जो उन्हीं पर अपनी रक्षा के लिए आश्रित रहते हैं, सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं, किन्तु किसी अनुचित व्यक्ति को उन्हें प्रसन्न कर पाने में कठिनाई होती है।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक जीवात्मा को और विशेष रूप से मनुष्यों को परमेश्वर की कृपा से प्राप्त होने वाले वरदानों के लिए उनका कृतज्ञ होना चाहिए। अत: कृतज्ञ एवं सरल हृदय वाले को कृष्णभक्त होना चाहिए और कृष्णभक्ति करनी चाहिए। जो लोग वास्तविक चोर तथा उचक्के हैं, वे भगवान् द्वारा प्रदत्त वरदानों को न तो पहचानते हैं, न उसके लिए आभार प्रकट करते हैं, ईश्वर की भक्ति करना तो दूर की बात है। जो भगवान् की व्यवस्था से मिलने वाले लाभों को नहीं समझते वे कृतघ्न हैं। वे धूप तथा चाँदनी का आनन्द उठाते हैं और नि:शुल्क जल प्राप्त करते हैं, किन्तु कृतज्ञता का अनुभव नहीं करते, तो भी वे भगवान् के इन उपहारों को भोगते रहते हैं। इसीलिए उन्हें चोर और उचक्के कहा ही जाना चाहिए।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥