श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 5

 
श्लोक
गदायामपविद्धायां हाहाकारे विनिर्गते ।
मानयामास तद्धर्मं सुनाभं चास्मरद्विभु: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
गदायाम्—ज्योंही उनकी गदा; अपविद्धायाम्—गिरी; हाहा-कारे—हाहाकार, कुहराम; विनिर्गते—मच गया; मानयाम् आस—स्वीकार किया; तत्—हिरण्याक्ष की; धर्मम्—सत्यता; सुनाभम्—सुदर्शन चक्र; च—तथा; अस्मरत्—स्मरण किया; विभु:—श्रीभगवान् ने ।.
 
अनुवाद
 
 ज्योंही भगवान् की गदा भूमि पर गिर गई और देखने वाले देवताओं तथा ऋषियों के समूह में हाहाकार मच गया, त्योंही श्रीभगवान् ने असुर की धर्मप्रियता की प्रशंसा की और फिर अपने सुदर्शन चक्र का आवाहन किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥