श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिता: ।
भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युप्तात्मनो हरौ ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
देवस्य—भगवान् की; मायया—माया के प्रभाव से; स्पृष्टा:—दूषित हुए; ये—जो लोग; च—तथा; अन्यत्—अन्य लोग; असत्—मायावी; आश्रिता:—वशीभूत; भ्राम्यते—मोहग्रस्त बनाते हैं; धी:—बुद्धि; न—नहीं; तत्—उनके; वाक्यै:—वचनों से; आत्मनि—परमात्मा में; उप्त-आत्मन:—शरणागत आत्माएँ; हरौ—हरि के प्रति ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की माया द्वारा मोहित व्यक्तियों के वचन किसी भी स्थिति में उन लोगों की बुद्धि को विचलित नहीं कर सकते जो पूर्णतया शरणागत हैं।
 
तात्पर्य
 वेदों के समस्त प्रमाणों के अनुसार श्रीकृष्ण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। सभी आचार्यों ने, यहाँ तक कि श्रीपाद शंकराचार्य ने उन्हें भगवान् स्वीकार किया है, किन्तु जब कृष्ण इस संसार में विद्यमान थे तो विभिन्न श्रेणी के व्यक्तियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से उन्हें स्वीकार किया। अतएव भगवान् विषयक उनके अनुमान भी भिन्न-भिन्न थे। सामान्यतया जिन लोगों को शास्त्रों में विश्वास था उन्होंने भगवान् को यथारूप में स्वीकार किया और इस जगत से भगवान् के अन्तर्धान होने पर सारे लोग उनके विकट विछोह में डूब गये। प्रथम स्कन्ध में हम अर्जुन तथा युधिष्ठिर के शोक की विवेचना कर चुके हैं, जिनके लिए कृष्ण का अन्तर्धान होना उनके जीवन के अन्त तक अतीव असह्य बना रहा। यादवगण भगवान् से आंशिक रूप में अवगत थे। वे भी महिमावान हैं, क्योंकि उन्हें अपने परिवार के प्रमुख के रूप में भगवान् की संगति करने का अवसर मिला था और उन लोगों ने भगवान् की अन्तरंग सेवा भी की थी। यादवगण तथा भगवान् के अन्य भक्त उन लोगों से भिन्न हैं, जिन्होंने गलत आकलन द्वारा उन्हें सामान्य व्यक्ति मान लिया था। ऐसे लोग निश्चित रूप से माया द्वारा भ्रमित होते हैं। वे नारकीय
होते हैं और भगवान् से ईर्ष्या करते हैं। उन पर माया अत्यन्त बलपूर्वक कार्य करती है, क्योंकि ऐसे लोग उच्च संसारी शिक्षा के बावजूद श्रद्धाविहीन होते हैं तथा नास्तिकता की मानसिकता से संदूषित होते हैं। वे लोग यह स्थापित करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं कि कृष्ण सामान्य पुरुष थे, जो पृथ्वी के आसुरी राजाओं अर्थात्, धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा जरासन्ध को मारने का षड्यंत्र करने के पापों के फलस्वरूप एक शिकारी द्वारा मार डाले गये। वे भगवद्गीता के इन कथनों में कोई विश्वास नहीं रखते कि भगवान् कर्मफलों से अप्रभावित रहते हैं—न मां कर्माणि लिम्पन्ति। नास्तिकतावादी दृष्टिकोण के अनुसार भगवान् कृष्ण का सारा परिवार यदुवंश, कृष्ण द्वारा धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करने आदि के फलस्वरूप किये गये पापों के कारण ब्राह्मणों से शापित होने से विनष्ट हो गया। ये लांछन भगवद्भक्तों के हृदय को स्पर्श नहीं करते, क्योंकि वे वास्तविकता जानते रहते हैं। भगवान् के सम्बन्ध में उनकी बुद्धि कभी विचलित नहीं होती। किन्तु जो लोग असुरों के कथनों से विचलित हो उठते हैं उनकी भी भर्त्सना की जाती है। इस श्लोक में उद्धव यही कहना चाहते हैं।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥