श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
यस्यानुरागप्लुतहासरास-
लीलावलोकप्रतिलब्धमाना: ।
व्रजस्त्रियो द‍ृग्भिरनुप्रवृत्त-
धियोऽवतस्थु: किल कृत्यशेषा: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसकी; अनुराग—आसक्ति; प्लुत—वर्धित; हास—हँसी; रास—मजाक, विनोद; लीला—लीलाएँ; अवलोक— चितवन; प्रतिलब्ध—से प्राप्त; माना:—व्यथित; व्रज-स्त्रिय:—व्रज की बालाएँ; दृग्भि:—आँखों से; अनुप्रवृत्त—अनुगमन करती; धिय:—बुद्धि द्वारा; अवतस्थु:—चुपचाप बैठ गईं; किल—निस्सन्देह; कृत्य-शेषा:—घर का काम काज ।.
 
अनुवाद
 
 हँसी, विनोद तथा देखादेखी की लीलाओं के पश्चात् व्रज की बालाएँ कृष्ण के चले जाने पर व्यथित हो जातीं। वे अपनी आँखों से उनका पीछा करती थीं, अत: वे हतबुद्धि होकर बैठ जातीं और अपने घरेलू कामकाज पूरा न कर पातीं।
 
तात्पर्य
 वृन्दावन में अपनी बाल्यावस्था में भगवान् कृष्ण समवयस्का सारी बालाओं को दिव्य प्रेमवश छेड़छाड़ करने के लिए प्रख्यात थे। उनके प्रति कृष्ण का प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि उस आनन्द की कोई तुलना नहीं है और व्रज बालाएँ उन पर इतनी अनुरक्त थीं कि ब्रह्मा तथा शिव जैसे महान् देवताओं के भी स्नेह से बढक़र उनका स्नेह था। भगवान् कृष्ण ने अन्त में गोपियों के दिव्य स्नेह के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार की और घोषित किया कि वे उनके विशुद्ध स्नेह से कभी उऋण नहीं हो सकते। यद्यपि गोपियाँ भगवान् के तंग करने के व्यवहार पर व्यथित प्रतीत होती थीं, किन्तु जब कृष्ण उन्हें छोड़ कर जाते तो वे इस विरह को न सह सकतीं और अपने नेत्रों तथा मन से उनका पीछा करती थीं। वे इस स्थिति से इतनी स्तब्ध हो उठतीं कि वे अपने घरेलू कामकाज पूरा न कर पातीं। युवकों तथा युवतियों के मध्य प्रेम-व्यापार में भी कोई उनसे आगे न बढ़ सकता। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान् स्वयं कभी भी वृन्दावन की सीमा से बाहर नहीं जाते। वे वहाँ के निवासियों के दिव्य प्रेम के वशीभूत होकर निरन्तर वहाँ रहते जाते हैं। इस तरह यद्यपि आज कल वे दृष्टिगोचर नहीं हैं, किन्तु वे क्षण भर के लिए भी वृन्दावन से दूर नहीं जाते।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥