श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
स्वशान्तरूपेष्वितरै: स्वरूपै-
रभ्यर्द्यमानेष्वनुकम्पितात्मा ।
परावरेशो महदंशयुक्तो
ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्नि: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-शान्त-रूपेषु—अपने शान्त भक्तों के प्रति; इतरै:—अन्यों, अभक्तों; स्व-रूपै:—अपने गुणों के अनुसार; अभ्यर्द्यमानेषु— सताए जाकर; अनुकम्पित-आत्मा—सर्वदयामय भगवान्; पर-अवर—आध्यात्मिक तथा भौतिक; ईश:—नियंत्रक; महत्-अंश युक्त:—महत् तत्त्व अंश के साथ; हि—निश्चय ही; अज:—अजन्मा; अपि—यद्यपि; जात:—उत्पन्न है; भगवान्—भगवान्; यथा—मानो; अग्नि:—आग ।.
 
अनुवाद
 
 आध्यात्मिक तथा भौतिक सृष्टियों के सर्वदयालु नियन्ता भगवान् अजन्मा हैं, किन्तु जब उनके शान्त भक्तों तथा भौतिक गुणों वाले व्यक्तियों के बीच संघर्ष होता है, तो वे महत् तत्त्व के साथ उसी तरह जन्म लेते हैं जिस तरह अग्नि उत्पन्न होती है।
 
तात्पर्य
 भगवद्भक्त स्वभाव से शान्त होते हैं, क्योंकि उनमें कोई भौतिक लालसा नहीं होती। मुक्तात्मा लालसारहित होता है, अतएव उसे शोक नहीं होता। जो व्यक्ति कुछ सम्पत्ति पाना चाहता है, और जब वह उसे खो देता है, तो वह भी शोक करता है। भक्तों में भौतिक सम्पत्ति के लिए अथवा आध्यात्मिक मोक्ष के लिए कोई लालसा नहीं होती। वे कर्तव्य के रूप में भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में स्थित होते हैं और वे इसकी परवाह नहीं करते कि वे कहाँ हैं अथवा उन्हें किस तरह कार्य करना चाहिए। कर्मी, ज्ञानी तथा योगी, सभी कुछ न कुछ भौतिक या आध्यात्मिक सम्पत्ति के लिए लालायित रहते हैं। कर्मीजन भौतिक सम्पत्ति चाहते हैं, ज्ञानी तथा योगीजन आध्यात्मिक सम्पत्ति चाहते हैं, किन्तु भक्तगण कोई भौतिक या आध्यात्मिक सम्पत्ति नहीं चाहते। वे भौतिक अथवा आध्यात्मिक लोकों में कहीं भी भगवान् की इच्छानुसार केवल उनकी सेवा करना चाहते हैं और भगवान् ऐसे भक्तों के प्रति सदैव ही विशेषरूप से ही दयालु रहते हैं।

कर्मियों, ज्ञानियों तथा योगियों की प्रकृति के गुणों में विशेष प्रवृत्तियाँ होती हैं, अतएव वे इतर या अभक्त कहलाते हैं। ये इतरजन जिनमें योगी भी सम्मिलित हैं, कभी-कभी भगवद्भक्तों को सताते हैं। महान् योगी दुर्वासा मुनि ने महाराज अम्बरीष को इसलिए सताया कि वे भगवान् के महान् भक्त थे। महान् कर्मी तथा ज्ञानी हिरण्यकशिपु ने अपने ही वैष्णव पुत्र प्रह्लाद महाराज को सताया। इतरों द्वारा शान्त भगवद्भक्तों के सताये जाने के ऐसे अनेक उदाहरण हैं। जब ऐसा टकराव होता छिड़ता है, तो भगवान् अपने शुद्ध भक्तों के प्रति महान् कृपा-वश महत् तत्त्व को नियंत्रित करने वाले अपने स्वांशों के साथ साकार रूप में प्रकट होते हैं।

भगवान् सर्वत्र, भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगतों में हैं और जब उनके भक्तों तथा अभक्तों के बीच संघर्ष छिड़ता है, तो वे अपने भक्तों के लिए प्रकट होते हैं। जिस तरह पदार्थ के घर्षण से कहीं भी बिजली उत्पन्न हो जाती है, उसी तरह भगवान् सर्वव्यापी होने के कारण भक्तों तथा अभक्तों के संघर्ष के कारण कहीं भी उत्पन्न होते हैं। जब भगवान् कृष्ण किसी उद्देश्य (मिशन) के लिए प्रकट होते हैं, तो उनके सारे स्वांश उनके साथ होते हैं। जब वे वसुदेव के पुत्र रूप में प्रकट हुए तो उनके अवतार के विषय में मतभेद था। कुछ ने कहा “वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।” कुछ ने कहा “वे नारायण के अवतार हैं।” दूसरों ने कहा “वे क्षीरोदकशायी विष्णु के अवतार हैं” किन्तु वास्तव में वे आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं—कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् तथा नारायण, सारे पुरुष एवं अन्य अवतार, उनकी लीलाओं के विभिन्न अंगों का कार्य करने के लिए उनके साथ आते हैं। महद्-अंश-युक्त: यह संकेत देता है कि उनके साथ पुरुष रहते हैं, जो महत् तत्त्व की सृष्टि करते हैं। इसकी पुष्टि इस वैदिक स्तुति महान्तं विभुमात्मानम् से होती है।

जब कंस तथा वसुदेव एवं उग्रसेन के बीच टकराव हुआ तो भगवान् कृष्ण बिजली की तरह प्रकट हो गये। वसुदेव तथा उग्रसेन भगवान् के भक्त थे और कंस कर्मियों तथा ज्ञानियों का प्रतिनिधि अभक्त था। कृष्ण अपने यथारूप में सूर्य के समान हैं। वे सर्वप्रथम देवकी के गर्भरूपी सागर से उदित हुए, धीरे-धीरे उन्होंने मथुरा के निकटवर्ती स्थानों के निवासियों को तुष्ट किया जिस तरह सूर्य प्रात:काल कमल के फूल को प्रफुल्लित कर देता है। क्रमश: द्वारका के मध्याकाश तक उठकर भगवान् सूर्य की ही तरह सारी वस्तुओं को अंधकार में छोड़ते हुए अस्त हो गये जैसाकि उद्धव ने वर्णन किया।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥