श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
दुनोति चेत: स्मरतो ममैतद्
यदाह पादावभिवन्द्य पित्रो: ।
ताताम्ब कंसादुरुशङ्कितानां
प्रसीदतं नोऽकृतनिष्कृतीनाम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
दुनोति—मुझे पीड़ा पहुँचाता है; चेत:—हृदय; स्मरत:—सोचते हुए; मम—मेरा; एतत्—यह; यत्—जितना; आह—कहा; पादौ—चरणों की; अभिवन्द्य—पूजकर; पित्रो:—माता-पिता के; तात—हे पिता; अम्ब—हे माता; कंसात्—कंस से; उरु— महान्; शङ्कितानाम्—भयभीतों का; प्रसीदतम्—प्रसन्न हों; न:—हमारा; अकृत—सम्पन्न नहीं हुआ; निष्कृतीनाम्—आपकी सेवा करने के कर्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण ने अपने माता-पिता से उनके चरणों की सेवा न कर पाने की अपनी (कृष्ण तथा बलराम की) अक्षमता के लिए क्षमा माँगी, क्योंकि कंस के विकट भय के कारण वे घर से दूर रहते रहे। उन्होंने कहा, “हे माता, हे पिता, हमारी असमर्थता के लिए हमें क्षमा करें।” भगवान् का यह सारा आचरण मेरे हृदय को पीड़ा पहुँचाता है।
 
तात्पर्य
 ऐसा लगता है कि कृष्ण तथा बलराम दोनों ही कंस से अत्यधिक भयभीत थे, इसीलिए उन्हें अपने आपको छिपा कर रखना पड़ा। किन्तु यदि कृष्ण तथा बलराम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, तो यह कैसे सम्भव हो सकता है कि वे कंस से भयभीत थे? क्या ऐसे कथनों में कोई विरोध है? वसुदेव कृष्ण के प्रति प्रगाढ़ प्रेम के कारण उन्हें संरक्षण प्रदान करना चाहते थे। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि कृष्ण परमेश्वर हैं और वे स्वयं अपनी रक्षा कर सकते हैं। उन्होंने कृष्ण को अपना पुत्र समझा। चूँकि वसुदेव महाभागवत थे, अतएव वे यह सोचना नहीं चाहते थे कि कृष्ण उनके अन्य पुत्रों की तरह मार डाले जाँए। नैतिक दृष्टि से वसुदेव कृष्ण को कंस के हाथों सौंपने के लिए वचनबद्ध थे, क्योंकि उन्होंने सारी सन्तानें उसे दे देने का वचन दिया था। किन्तु कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम के कारण उन्होंने अपना वचन तोड़ा। वसुदेव की इस दिव्य मनोवृत्ति पर भगवान् अत्यधिक प्रसन्न थे। वे वसुदेव के अगाध स्नेह को विचलित नहीं करना चाहते थे, अतएव उन्होंने अपने पिता द्वारा नन्द तथा यशोदा के घर ले जाया जाना स्वीकार कर लिया। फिर वसुदेव के प्रगाढ़ प्रेम की परीक्षा करने के लिए ही जब उनके पिता नदी पार कर रहे थे तो भगवान् कृष्ण यमुना के जल में गिर पड़े थे तब वसुदेव अपने पुत्र को उफनती नदी के बीच में फिर से पा लेने के प्रयास में बावले हो गये थे।

ये सब भगवान् की महिमामण्डित लीलाएँ हैं और ऐसे प्रदर्शन में कोई विरोधाभास नहीं है। चूँकि कृष्ण परमेश्वर हैं, अतएव वे कंस से कभी भी भयभीत नहीं थे, किन्तु अपने पिता को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने ऐसा करना स्वीकार किया। उनके परम चरित्र का सबसे यशस्वी अंश यह था कि उन्होंने अपने माता-पिता से इसके लिए क्षमा माँगी कि कंस के भय से घर से अनुपस्थित रहने के कारण वे उनके चरणों की सेवा नहीं कर सके। वे भगवान्, जिनके चरणकमलों की पूजा ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं द्वारा की जाती है, वसुदेव के चरणों की पूजा करना चाहते थे। भगवान् द्वारा विश्व को दिया गया ऐसा उपदेश अत्यन्त उपयुक्त है। चाहे कोई भगवान् ही क्यों न हो उसे अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। पुत्र अनेक प्रकार से अपने माता-पिता का ऋणी होता है और पुत्र चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो उसका यह कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता की सेवा करे। अप्रत्यक्ष रूप से, कृष्ण उन नास्तिकों को, जो ईश्वर के परम पितृत्व को स्वीकार नहीं करते, शिक्षा देना चाहते थे और वे इस कार्य से यह सीख सकते हैं कि परम पिता का कितना अधिक सम्मान किया जाना चाहिए। उद्धव भगवान् के ऐसे यशस्वी आचरण पर आश्चर्यचकित थे और वे अत्यन्त दुखी थे कि वे उनके साथ क्यों नहीं कूच कर सके।

 
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