श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
तथैव चान्ये नरलोकवीरा
य आहवे कृष्णमुखारविन्दम् ।
नेत्रै: पिबन्तो नयनाभिरामं
पार्थास्त्रपूत: पदमापुरस्य ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
तथा—भी; एव च—तथा निश्चय ही; अन्ये—अन्य; नर-लोक—मानव समाज; वीरा:—योद्धा; ये—जो; आहवे—युद्धभूमि (कुरुक्षेत्र की) में; कृष्ण—भगवान् कृष्ण का; मुख-अरविन्दम्—कमल के फूल जैसा मुँह; नेत्रै:—नेत्रों से; पिबन्त:—देखते हुए; नयन-अभिरामम्—आँखों को अतीव अच्छा लगने वाले; पार्थ—अर्जुन के; अस्त्र-पूत:—बाणों से शुद्ध हुआ; पदम्— धाम; आपु:—प्राप्त किया; अस्य—उनका ।.
 
अनुवाद
 
 निश्चय ही कुरुक्षेत्र युद्धस्थल के अन्य योद्धागण अर्जुन के बाणों के प्रहार से शुद्ध बन गये और आँखों को अति मनभावन लगने वाले कृष्ण के कमल-मुख को देखकर उन्होंने भगवद्धाम प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण इस जगत में दो उद्देश्यों से प्रकट होते हैं—श्रद्धावानों का उद्धार करने तथा दुष्टों का संहार करने, किन्तु परम पूर्ण होने से भगवान् के ये दो प्रकार के कार्य भले ही ऊपर से भिन्न लगें, किन्तु अन्तत: एक ही होते हैं। शिशुपाल जैसे व्यक्ति का उनके द्वारा संहार किया जाना उतना ही शुभ है जितना कि श्रद्धावान की रक्षा के लिए किया जानेवाला कार्य। उन सारे योद्धाओं ने, जिन्होंने अर्जुन के विरुद्ध युद्ध किया था, किन्तु युद्धभूमि में भगवान् के कमलवत् मुख का दर्शन किया था, उसी तरह भगवद्धाम प्राप्त किया जिस तरह भगवान् के भक्त प्राप्त करते हैं। “द्रष्टा की आखों को अच्छा लगने वाले” ये शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। जब युद्धभूमि के दूसरे पक्ष के योद्धाओं ने भगवान् कृष्ण को सामने से देखा तो उन्होंने उनके सौन्दर्य को सराहा और ईश्वर के प्रति उनकी सुसुप्त भावना जागृत हो उठी। शिशुपाल ने भी भगवान् को देखा, किन्तु उसने उन्हें अपने शत्रु के रूप में देखा जिससे उसका प्रेम जागृत नहीं हुआ। इसलिए शिशुपाल ने भगवान् के शरीर की निर्विशेष ज्योति, ब्रह्मज्योति में लीन होकर भगवान् से तादात्म्य प्राप्त किया। अन्य लोगों को जो तटस्थ थे, जो न तो मित्र थे न शत्रु, किन्तु भगवान् के मुख के सौन्दर्य को सराहने के कारण यत्किंचित भगवान् के प्रेम में थे, उन्हें तुरन्त वैकुण्ठलोक भेज दिया गया। भगवान् का निजी धाम गोलोक वृन्दावन कहलाता है और वे धाम, जहाँ उनके स्वांश निवास करते हैं वैकुण्ठलोक कहलाते हैं जहाँ भगवान् नारायण रूप में विद्यमान रहते हैं। हर जीव में भगवत्प्रेम प्रसुप्त रहता है और भगवान् की भक्ति की समूची विधि इस प्रसुप्त नित्य भगवत्प्रेम को जागृत करने के लिए होती है। किन्तु ऐसी दिव्य जागृति की कोटियाँ होती हैं। जिन लोगों में भगवत्प्रेम पूरी तरह जागृत हुआ रहता है वे आध्यात्मिक आकाश में गोलोक वृन्दावन लोक जाते हैं, किन्तु जिन लोगों में संयोगवश या संगति के द्वारा भगवत्प्रेम ठीक से जागृत हुआ होता है वे वैकुण्ठलोक भेज दिये जाते हैं। तात्विक दृष्टि से गोलोक तथा वैकुण्ठ में कोई अन्तर नहीं है, किन्तु वैकुण्ठ में भगवान् की सेवा असीम ऐश्वर्य द्वारा की जाती है, जबकि गोलोक में उनकी सेवा सहज स्नेह भाव में की जाती है।

यह भगवत्प्रेम भगवान् के शुद्ध भक्तों की संगति से जागृत होता है। यहाँ पर पार्थास्त्र-पूत: शब्द महत्त्वपूर्ण है। जिन लोगों ने कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में भगवान् की सुन्दर मुखाकृति देखी थी, उन्हें पहले अर्जुन ने अपने बाणों के प्रहार से शुद्ध बना दिया था। भगवान् संसार का भार हल्का करने के उद्देश्य से प्रकट हुए थे और अर्जुन उनकी ओर से युद्ध करके उनकी सहायता कर रहे थे। अर्जुन ने व्यक्तिगत रूप से युद्ध करने से इनकार कर दिया था और अर्जुन को युद्ध में लगाने के लिए भगवद्गीता का सम्पूर्ण उपदेश दिया गया था। भगवान् के शुद्ध भक्त के रूप में अर्जुन ने अपने निर्णय के समक्ष इसे वरीयता देते हुए युद्ध करना स्वीकार किया। इस तरह अर्जुन ने संसार के भार को कम करने के भगवान् के उद्देश्य में सहायक बनने के लिए युद्ध किया। शुद्ध भक्त द्वारा सारे कार्य भगवान् की ओर से सम्पन्न किये जाते हैं, क्योंकि भगवान् के शुद्ध भक्त के पास करने के लिए निजी कुछ भी नहीं रहता। अर्जुन द्वारा संहार किया जाना स्वयं भगवान् द्वारा किये जाने वाले संहार के तुल्य था। ज्योंही अर्जुन किसी शत्रु पर बाण चलाते, वह शत्रु सारे भौतिक कल्मष से शुद्ध बनकर वैकुण्ठ जाने का पात्र बन जाता। जिन योद्धाओं ने भगवान् के चरणकमलों की प्रशंसा की तथा सामने से भगवान् के मुख को देखा उनमें सुप्त भगवत्प्रेम जाग उठा और इस तरह वे लोग शिशुपाल की ही तरह ब्रह्मज्योति की निर्विशेष दशा में नहीं, अपितु सीधे, वैकुण्ठलोक भेज दिये गये। शिशुपाल भगवान् की प्रशंसा किये बिना मर गया, किन्तु अन्य लोग भगवान् की प्रशंसा करके मरे थे। दोनों ही को आध्यात्मिक आकाश में भेज दिया गया, किन्तु जिनमें भगवत्प्रेम जागृत हो चुका था वे दिव्य आकाश के लोकों में भेज दिये गये। उद्धव ऊपर से शोक कर रहे थे कि उनका अपना पद कुरुक्षेत्र युद्धभूमि के योद्धाओं से भी न्यून है, क्योंकि उन लोगों को तो वैकुण्ठलोक मिल चुका था, जबकि उद्धव भगवान् के तिरोधान का शोक ही करते रह गये।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥