श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
स्वयं त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीश:
स्वाराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकाम: ।
बलिं हरद्‍‌भिश्चिरलोकपालै:
किरीटकोट्येडितपादपीठ: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
स्वयम्—स्वयं; तु—लेकिन; असाम्य—अद्वितीय; अतिशय:—महत्तर; त्रि-अधीश:—तीन का स्वामी; स्वाराज्य—स्वतंत्र सत्ता; लक्ष्मी—सम्पत्ति; आप्त—प्राप्त किया; समस्त-काम:—सारी इच्छाएँ; बलिम्—पूजा की साज सामग्री; हरद्भि:—प्रदत्त; चिर लोक-पालै:—सृष्टि की व्यवस्था को नित्य बनाये रखने वालों द्वारा; किरीट-कोटि—करोड़ों मुकुट; एडित-पाद-पीठ:— स्तुतियों द्वारा सम्मानित पाँव ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्रीकृष्ण समस्त त्रयियों के स्वामी हैं और समस्त प्रकार के सौभाग्य की उपलब्धि के द्वारा स्वतंत्र रूप से सर्वोच्च हैं। वे सृष्टि के नित्य लोकपालों द्वारा पूजित हैं, जो अपने करोड़ों मुकुटों द्वारा उनके पाँवों का स्पर्श करके उन्हें पूजा की साज-सामग्री अर्पित करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त उदार तथा कृपालु हैं जैसाकि ऊपर के श्लोकों में बतलाया गया है, फिर भी वे समस्त त्रयियों के स्वामी हैं। वे तीन लोकों, प्रकृति के तीन गुणों तथा तीन पुरुषों (कारणोदकशायी, गर्भोदकशायी तथा क्षीरोदकशायी विष्णु) के स्वामी हैं। ब्रह्माण्ड अनन्त हैं और इनमें से प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र के विभिन्न स्वरूप हैं। इनके अतिरिक्त, शेषमूर्ति भी हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डों को अपने फनों पर धारण करते हैं। भगवान् कृष्ण इन सबों के स्वामी हैं। मनु के अवतार रूप में वे असंख्य ब्रह्माण्डों में समस्त मनुओं के आदि स्रोत हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ५,०४,००० मनु होते हैं। भगवान् तीन प्रधान शक्तियों—चितशक्ति, मायाशक्ति तथा तटस्थशक्ति के स्वामी हैं और वे षडैश्वर्यों—धन, बल, यश, सौन्दर्य, ज्ञान तथा वैराग्य—के समग्रस्वामी हैं। ऐसा अन्य कोई नहीं जो भोग की किसी बात में उनसे बढक़र हो और उनसे बड़ा तो कोई है ही नहीं। कोई उनके तुल्य या उनसे बढक़र नहीं है। हर व्यक्ति चाहे वह जो भी हो तथा जहाँ भी हो, उसका यह कर्तव्य है कि पूरी तरह उनकी शरण ग्रहण करे। अतएव यह आश्चर्यजनक नहीं है कि सारे लोकपाल उनके शरणागत बनकर उन्हें पूजा की सारी वस्तुएँ अर्पित करते हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥