श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
वसुदेवस्य देवक्यां जातो भोजेन्द्रबन्धने ।
चिकीर्षुर्भगवानस्या: शमजेनाभियाचित: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
वसुदेवस्य—वसुदेव की पत्नी के; देवक्याम्—देवकी के गर्भ में; जात:—उत्पन्न; भोज-इन्द्र—भोजों के राजा के; बन्धने— बन्दीगृह में; चिकीर्षु:—करने के लिए; भगवान्—भगवान्; अस्या:—पृथ्वी का; शम्—कल्याण; अजेन—ब्रह्म द्वारा; अभियाचित:—याचना किये जाने पर ।.
 
अनुवाद
 
 पृथ्वी पर कल्याण लाने के लिए ब्रह्मा द्वारा याचना किये जाने पर भगवान् श्री कृष्ण को भोज के राजा के बन्दीगृह में वसुदेव ने अपनी पत्नी देवकी के गर्भ से उत्पन्न किया।
 
तात्पर्य
 यद्यपि भगवान् के आविर्भाव तथा तिरोभाव में कोई अन्तर नहीं होता, किन्तु भक्तगण सामान्यतया उनके तिरोभाव के विषय में चर्चा नहीं करते। विदुर ने उद्धव से कृष्णकथा सुनाने के लिए आग्रह करके भगवान् के तिरोधान की घटना के विषय में उद्धव से अप्रत्यक्ष रूप से पूछा। अत: उद्धव ने भोजों के राजा कंस के मथुरा बन्दीगृह में वसुदेव तथा देवकी के पुत्र रूप में उनके आविर्भाव से कथा कहनी प्रारम्भ की। इस जगत में भगवान् के लिए कोई काम नहीं हैं, किन्तु जब ब्रह्मा जैसे भक्तों द्वारा उनसे अनुरोध किया जाता है, तो वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कल्याण हेतु पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। भगवद्गीता (४.८) में इसका उल्लेख हुआ है—

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥