श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
स एव गोधनं लक्ष्म्या निकेतं सितगोवृषम् ।
चारयन्ननुगान् गोपान् रणद्वेणुररीरमत् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (कृष्ण); एव—निश्चय ही; गो-धनम्—गौ रूपी खजाना; लक्ष्म्या:—ऐश्वर्य से; निकेतम्—आगार; सित-गो वृषम्—सुन्दर गौवें तथा बैल; चारयन्—चराते हुए; अनुगान्—अनुयायियों को; गोपान्—ग्वाल बालों को; रणत्—बजती हुई; वेणु:—वंशी; अरीरमत्—उल्लसित किया ।.
 
अनुवाद
 
 अत्यन्त सुन्दर गाय-बैलों को चराते हुए समस्त ऐश्वर्य तथा सम्पत्ति के आगार भगवान् अपनी वंशी बजाया करते। इस तरह वे अपने श्रद्धावान् अनुयायी ग्वाल-बालों को प्रफुल्लित करते थे।
 
तात्पर्य
 जब भगवान् छ:-सात वर्ष के हुए तो उन्हें चरागाहों में गौवों तथा बैलों की देखभाल करने का काम सौंप दिया गया। वे ऐसे सम्पन्न भूमिधर के पुत्र थे जिसके पास हजारों गौवें थीं। वैदिक अर्थशास्त्र के अनुसार मनुष्य अपने अन्न भंडार तथा गौवों के बल पर धनी व्यक्ति माना जाता है। केवल इन्हीं दो वस्तुओं, गौवों तथा अन्न, से मनुष्य अपनी खाद्य समस्या हल कर सकता है। मानव समाज को अपनी आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए केवल पर्याप्त अन्न तथा पर्याप्त गौवों की आवश्यकता होती है। इन दोनों वस्तुओं के अतिरिक्त बाकी सारी वस्तुएँ कृत्रिम आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें मनुष्य ने अपने मूल्यवान जीवन का हनन करने तथा व्यर्थ की वस्तुओं में अपना समय नष्ट करने के लिए उत्पन्न किया है। मानव समाज के शिक्षक रूप में भगवान् कृष्ण ने अपने कार्यों से यह दिखलाया कि वैश्यों को गौवें तथा बैल पालने चाहिए और मूल्यवान पशुओं को संरक्षण प्रदान करना चाहिए। स्मृति के नियमों के अनुसार गाय मनुष्य जाति की माता और बैल पिता है। गाय माता है, क्योंकि मनुष्य जिस तरह माता के स्तन का दूध पीता है, मानव समाज गाय का दूध पीता है। इसी तरह बैल मानव समाज का पिता है, क्योंकि पिता बच्चों के लिए उसी प्रकार कमाता है, जिस तरह कि बैल अन्न उत्पन्न करने के लिए भूमि जोतता है। मानव समाज पिता तथा माता का वध करके जीवन-आत्मा का हनन कर देगा। यहाँ इसका उल्लेख हुआ है कि सुन्दर गौवें तथा बैल विभिन्न चौकड़ीदार रंगों वाले थे लाल, काले, हरे, पीले, धूसर इत्यादि। उनके रंगों तथा स्वस्थ हँसमुख चेहरों के कारण वातावरण उल्लासपूर्ण था।

इन सबसे भी अधिक था, भगवान् अपनी सुविख्यात वंशी बजाया करते। उनकी वंशी की ध्वनि उनके मित्रों को दिव्य आनन्द प्रदान करती जिससे वे निर्विशेषवादियों द्वारा बहुप्रशंसित ब्रह्मानन्द की बातें भूल जाते थे। जैसाकि शुकदेव गोस्वामी बतलायेंगे, ये ग्वालबाल ऐसे जीव थे जिन्होंने ढेरों पुण्यकर्म संचित किये थे और जो भगवान् के साथ आनन्द ले रहे थे तथा उनकी दिव्य वंशी सुन रहे थे। ब्रह्म-संहिता से (५.३०) उनके द्वारा दिव्य वंशी बजाने की पुष्टि होती है : वेणुं क्वणन्तम् अरविन्ददलायताक्षं बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दरांगम् ।

कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि।

ब्रह्माजी ने कहा, “मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जो अपनी दिव्य वंशी बजाते हैं। उनकी आँखें कमल के फूलों जैसी हैं। वे मोरपंखों से सुशोभित हैं, और उनके शरीर का रंग नवीन श्याम बादल के सदृश है। उनका शारीरिक स्वरूप करोड़ों कामदेवों से भी अधिक सुन्दर है।” ये भगवान् के विशिष्ट गुण हैं।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥