श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
अयाजयद्गोसवेन गोपराजं द्विजोत्तमै: ।
वित्तस्य चोरुभारस्य चिकीर्षन् सद्वय‍यं विभु: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
अयाजयत्—सम्पन्न कराया; गो-सवेन—गौवों की पूजा द्वारा; गोप-राजम्—ग्वालों के राजा; द्विज-उत्तमै:—विद्वान ब्राह्मणों द्वारा; वित्तस्य—सम्पत्ति का; च—भी; उरु-भारस्य—महान् ऐश्वर्य; चिकीर्षन्—कार्य करने की इच्छा से; सत्-व्ययम्—उचित उपभोग; विभु:—महान् ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण महाराज नन्द की ऐश्वर्यशाली आर्थिक शक्ति का उपयोग गौवों की पूजा के लिए कराना चाहते थे और वे स्वर्ग के राजा इन्द्र को भी पाठ पढ़ाना चाह रहे थे। अत: उन्होंने अपने पिता को सलाह दी थी कि वे विद्वान ब्राह्मणों की सहायता से गो अर्थात् चरागाह तथा गौवों की पूजा कराएँ।
 
तात्पर्य
 चूँकि भगवान् सबों के शिक्षक हैं, अतएव उन्होंने अपने पिता नन्द महाराज को भी शिक्षा दी। नन्द महाराज एक सम्पन्न भूमिधर तथा अनेक गौवों के स्वामी थे और प्रथा के अनुसार वे प्रतिवर्ष स्वर्ग के राजा इन्द्र की पूजा बड़ी ही सजधज के साथ किया करते थे। वैदिक वाङ्मय में भी जनता द्वारा देवताओं की इस पूजा की सलाह दी गई है, जिससे लोग भगवान् की श्रेष्ठता को स्वीकार करें। देवता तो भगवान् के दास हैं, जिन्हें ब्रह्माण्ड विषयक विविध कार्यों का प्रबन्ध देखने के लिए नियुक्त किया गया हैं। इसलिए वैदिक शास्त्रों में सलाह दी गई हैं कि देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मनुष्य यज्ञ सम्पन्न करें। किन्तु जो व्यक्ति परमेश्वर की भक्ति करता है उसे देवताओं को प्रसन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है। सामान्यजनों द्वारा देवताओं की पूजा परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार करने की एक व्यवस्था है किन्तु ऐसा करना आवश्यक नहीं है। ऐसा तुष्टीकरण सामान्यतया भौतिक लाभों के लिए ही किया जाता है। जैसे कि इस ग्रन्थ के द्वितीय स्कन्ध में हम पहले ही कह चुके हैं, जो व्यक्ति भगवान् की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार कर लेता है, उसे गौण देवताओं की पूजा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कभी-कभी अल्पज्ञ जीवों द्वारा पूजा तथा आराधना किये जाने से देवता गर्वित हो उठते हैं और वे भगवान् की श्रेष्ठता को भूल जाते हैं। ऐसी ही घटना तब घटी जब भगवान् कृष्ण इस ब्रह्माण्ड में उपस्थित थे, अत: भगवान् ने स्वर्ग के राजा इन्द्र को पाठ सिखाना चाहा। उन्होंने नन्द महाराज से कहा कि वे इन्द्र को अर्पित किया जाने वाला यज्ञ बन्द कर दें और गौवों तथा गोवर्धन पर्वत पर स्थित चरागाहों की पूजा करके धन का समुचित उपयोग करें। इस कार्य से भगवान् कृष्ण ने मानव समाज को शिक्षा दी, जैसाकि भगवद्गीता में भी उन्होंने उपदेश दिया है कि मनुष्य को अपने समस्त कर्मों तथा उनके फलों द्वारा ब्रह्म की पूजा करनी चाहिए। इससे वांछित सफलता प्राप्त हो सकेगी। वैश्यों को विशेषरूप से सलाह दी गई है कि वे गौवों तथा उनके चरागाहों की कृषियोग्य भूमि को संरक्षण प्रदान करें और गाढ़ी कमाई को व्यर्थ न फूँकें। इससे भगवान् तुष्ट होंगे। अपने व्यवसायपरक कर्तव्य की पूर्णता, चाहे वह कर्तव्य अपने प्रति, अपनी जाति के प्रति या अपने राष्ट्र के प्रति हो, भगवान् की तुष्टि की कोटि से आँकी जाती है।
 
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