श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
दुर्भगो बत लोकोऽयं यदवो नितरामपि ।
ये संवसन्तो न विदुर्हरिं मीना इवोडुपम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
दुर्भग:—अभागा; बत—निश्चय ही; लोक:—ब्रह्माण्ड; अयम्—यह; यदव:—यदुकुल; नितराम्—विशेषरूप से; अपि—भी; ये—जो; संवसन्त:—एकसाथ रहते हुए; न—नहीं; विदु:—जान पाये; हरिम्—भगवान् को; मीना:—मछलियाँ; इव उडुपम्— चन्द्रमा की तरह ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त लोकों समेत यह ब्रह्माण्ड अत्यन्त अभागा है। युदुकुल के सदस्य तो उनसे भी बढक़र अभागे हैं, क्योंकि वे श्री हरि को भगवान् के रूप में नहीं पहचान पाये जिस तरह मछलियाँ चन्द्रमा को नहीं पहचान पातीं।
 
तात्पर्य
 उद्धव इस संसार के उन अभागे लोगों के प्रति शोक व्यक्त कर रहे थे, जो भगवान् कृष्ण के समस्त दिव्य सद्गुणों को देखते हुए भी उन्हें नहीं पहचान पाते। राजा कंस के बन्दीघर के सीकचों के भीतर उनके प्राकट्य से लेकर उनकी मौसल लीला तक मूर्ख लोग यह नहीं समझ पाये कि वे भगवान् थे, यद्यपि उन्होंने भगवान् के रूप में अपना षडेश्वर्य धन, बल, यश, सौंदर्य, ज्ञान तथा त्याग—

प्रदर्शित किया था। मूर्ख लोगों ने उन्हें एक अद्वितीय ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में समझा होगा, क्योंकि भगवान् से उनका घनिष्ठ सम्पर्क नहीं था, किन्तु इनसे भी अधिक अभागे भगवान् के पारिवारिक सदस्य यदुवंशी थे, जो भगवान् के संग में सदैव रहते हुए भी उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में नहीं पहचान पाये। उद्धव ने अपने भाग्य पर भी शोक व्यक्त किया, क्योंकि कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में जानते हुए भी वे इस अवसर का लाभ भगवान् की भक्ति करने में नहीं उठा पाये। उन्होंने स्वयं समेत सबों के भाग्य पर खेद प्रकट किया। भगवान् का शुद्ध भक्त अपने को सर्वाधिक अभागा सोचता है। ऐसा भगवत्प्रेम की अधिकता के कारण होता है और यह विरह की दिव्य अनुभूतियों में से एक है।

शास्त्रों से यह जानकारी मिलती है कि चन्द्रमा का जन्म क्षीर सागर से हुआ। क्षीर सागर ऊपरी लोकों में है और उसमें भगवान् विष्णु जो परमात्मा रूप में हर जीव के हृदय को नियंत्रित करने वाले हैं, क्षीरोकदशायी विष्णु के रूप में निवास करते हैं। जो लोग क्षीर सागर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, उन्होंने समुद्र में केवल नमकीन (खारे) जल का अनुभव किया है, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि यह संसार गो भी कहलाता है, जिसका अर्थ है गाय। गाय का मूत्र नमकीन होता है और आयुर्वेदिक ओषधि में गाय का मूत्र यकृत से पीडि़त रोगियों का उपचार करने में अत्यधिक प्रभावशाली होता है। ऐसे रोगियों को गाय के दूध का अनुभव नहीं होगा, क्योंकि यकृत रोगियों को दूध कभी नहीं दिया जाता। किन्तु यकृत रोगी को जानना चाहिए कि गाय दूध भी देती है भले ही उस रोगी ने दूध कभी न चखा हो। इसी तरह जिन लोगों को इस क्षुद्र लोक का ही अनुभव है, जिसमें केवल नमकीन जल का सागर विद्यमान है, वे शास्त्रों से यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि दूध का भी सागर (क्षीर सागर) होता है, भले ही उन्होंने उसे न देखा हो। इस क्षीर सागर से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ था, किन्तु क्षीर सागर की मछलियाँ यह नहीं पहचान पाईं कि चन्द्रमा उन जैसी मछली नहीं है। मछलियों ने चन्द्रमा को अपने जैसी मछली या कोई चमकीली वस्तु से अधिक कुछ नहीं मान रखा था। वे अभागे लोग जो कृष्ण को नहीं पहचान पाते वे ऐसी ही मछलियों के तुल्य हैं। वे उन्हें अपने में से एक, किन्तु ऐश्वर्य, बल आदि में कुछ अद्वितीय करके, मानते हैं। भगवद्गीता (९.११) में ऐसे मूर्ख व्यक्तियों को सर्वाधिक अभागा कहा गया है—अवजानन्ति मां मूढा: मानुषीं तनुमाश्रितम्।

 
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