श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
रज:प्रधानान्महतस्त्रिलिङ्गो दैवचोदितात् ।
जात: ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि पञ्चश: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
रज:-प्रधानात्—रजोगुण की प्रधानता से; महत:—महत्-तत्त्व से; त्रि-लिङ्ग:—तीन प्रकार का; दैव-चोदितात्—श्रेष्ठ अधिकारी के द्वारा प्रेरित; जात:—उत्पन्न हुआ; ससर्ज—विकसित हुआ; भूत-आदि:—अहंकार (भौतिक तत्त्वों का मूल); वियत्—शून्य; आदीनि—इत्यादि; पञ्चश:—पाँच पाँच के समूहों में ।.
 
अनुवाद
 
 जीव के भाग्य (दैव) की प्रेरणा से रजोगुण प्रधान महत्-तत्त्व से तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ। फिर अंहकार से पाँच-पाँच तत्त्वों के अनेक समूह उत्पन्न हुए।
 
तात्पर्य
 आद्य प्रकृति में तीन गुण होते हैं जिनसे पाँच-पाँच तत्त्वों के चार समूह उत्पन्न होते हैं। प्रथम समूह तात्विक है, जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश सम्मिलित हैं। पाँच तत्त्वों का दूसरा समूह तन्मात्र कहलाता है, जिससे सूक्ष्म तत्त्वों ध्वनि, स्पर्श, रूप, स्वाद तथा गंध का बोध होता है। तीसरा समूह पाँच ज्ञानेन्द्रियों आँख, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा का है। चौथा समूह पाँच कर्मेन्द्रियों जीभ, हाथ, पाँव, गुदा तथा लिंग का हैं। कुछ लोगों का विचार है कि पाँच पाँच के ऐसे पाँच समूह हैं—पहला पाँच तत्त्व, दूसरा पाँच भूत, तीसरा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, चौथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँचवाँ पंचदेवता जो इन विभागों पर नियन्त्रण रखते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥