श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
विससर्जात्मन: कायं नाभिनन्दंस्तमोमयम् ।
जगृहुर्यक्षरक्षांसि रात्रिं क्षुत्तृट्‌समुद्भवाम् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
विससर्ज—फेंक दिया; आत्मन:—अपना; कायम्—शरीर; न—नहीं; अभिनन्दन्—प्रसन्न होकर; तम:-मयम्— अज्ञान से युक्त; जगृहु:—अधिकार कर लिया; यक्ष-रक्षांसि—यक्ष तथा राक्षस; रात्रिम्—रात; क्षुत्—भूख; तृट्— प्यास; समुद्भवाम्—स्रोत ।.
 
अनुवाद
 
 क्रोध के कारण ब्रह्मा ने उस अविद्यामय शरीर को त्याग दिया। इस अवसर का लाभ उठाकर यक्ष तथा राक्षसगण उस रात्रि रूप में स्थित शरीर पर अधिकार जमाने के लिए कूद-फाँद मचाने लगे। रात्रि भूख तथा प्यास की स्रोत है।
 
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥