श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
क्षुत्तृड्भ्यामुपसृष्टास्ते तं जग्धुमभिदुद्रुवु: ।
मा रक्षतैनं जक्षध्वमित्यूचु: क्षुत्तृडर्दिता: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
क्षुत्-तृड्भ्याम्—भूख तथा प्यास से; उपसृष्टा:—पराजित; ते—वे असुर (यक्ष तथा राक्षस); तम्—ब्रह्मा को; जग्धुम्—खाने को; अभिदुद्रुवु:—आगे को दौड़ा; मा—मत; रक्षत—बचाओ, छोड़ो; एनम्—उसको; जक्षध्वम्— खाओ; इति—इस प्रकार; ऊचु:—कहा; क्षुत्-तृट्-अर्दिता:—भूख तथा प्यास से आकुल ।.
 
अनुवाद
 
 भूख तथा प्यास से अभिभूत होकर वे चारों ओर से ब्रह्मा को खा जाने के लिए दौड़े और चिल्लाए, “उसे मत छोड़ो, उसे खा जाओ।”
 
तात्पर्य
 आज भी विश्व के कुछ देशों में यक्षों तथा राक्षसों के प्रतिनिधि विद्यमान हैं। ऐसा माना जाता है कि ऐसे असभ्य मनुष्यों को अपने ही बाप-दादों को मारने में मजा आता है और वे उन शरीरों को भूनकर प्रेम-उत्सव मनाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥