श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
देवस्तानाह संविग्नो मा मां जक्षत रक्षत ।
अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं बभूविथ ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
देव:—ब्रह्माजी ने; तान्—उनको; आह—कहा; संविग्न:—चिन्तित; मा—मत; माम्—मुझको; जक्षत—खाओ; रक्षत—रक्षा करो; अहो—ओह; मे—मेरे; यक्ष-रक्षांसि—हे यक्ष तथा राक्षसों; प्रजा:—पुत्र; यूयम्—तुम सब; बभूविथ—उत्पन्न हुए थे ।.
 
अनुवाद
 
 देवताओं के प्रधान ब्रह्माजी ने घबराकर उनसे कहा, “मुझे खाओ नहीं, मेरी रक्षा करो। तुम मुझसे उत्पन्न हो और मेरे पुत्र हो चुके हो। अत: तुम लोग यक्ष तथा राक्षस हो।”
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा के शरीर से उत्पन्न असुर, यक्ष तथा राक्षस कहलाये क्योंकि उनमें से कुछ चिल्लाए कि ब्रह्मा को मारकर खा जाओ और कुछ ने कहा रक्षा मत करो। जिन्होंने कहा था कि ब्रह्मा को खा जाओ वे यक्ष कहलाए और जिन्होंने कहा इसकी रक्षा मत करो वे राक्षस अर्थात् मानवभक्षी कहलाए। यक्ष तथा राक्षस ये दोनों ब्रह्मा की आदि सृष्टि हैं और आज भी असभ्य मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं और में सारे संसार में फैले हुए हैं। वे तमोगुण से उत्पन्न हैं, अत: अपने आचरण के कारण वे राक्षस अर्थात् मानवभक्षी कहलाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥