हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.20.22 
देवता: प्रभया या या दीव्यन् प्रमुखतोऽसृजत् ।
ते अहार्षुर्देवयन्तो विसृष्टां तां प्रभामह: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
देवता:—देवतागण; प्रभया—प्रकाश के तेज से; या: या:—जो जो; दीव्यन्—चमकते हुए; प्रमुखत:—मुख्य रूप से; असृजत्—उत्पन्न किया; ते—उन्होंने; अहार्षु:—अधिकार जमा लिया; देवयन्त:—सक्रिय होने से; विसृष्टाम्—पृथक् किया हुआ; ताम्—उस; प्रभाम्—तेज को; अह:—दिन ।.
 
अनुवाद
 
 तब उन्होंने प्रमुख देवताओं की सृष्टि की जो सात्त्विक प्रभा से चमचमा रहे थे। उन्होंने देवताओं के समक्ष दिन का तेज फैला दिया जिस पर देवताओं ने खेल-खेल में ही अधिकार जमा लिया।
 
तात्पर्य
 रात्रि की सृष्टि के साथ असुर और दिन की उत्पत्ति के साथ देवता उत्पन्न हुए। दूसरे शब्दों में, यक्ष तथा राक्षस जैसे असुर अविद्या के गुण से और देवता सात्त्विकता के गुण से उत्पन्न हुए हैं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to  वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
>  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥