श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
देवोऽदेवाञ्जघनत: सृजति स्मातिलोलुपान् ।
त एनं लोलुपतया मैथुनायाभिपेदिरे ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
देव:—ब्रह्माजी ने; अदेवान्—असुरों को; जघनत:—अपने नितंबों से; सृजति स्म—उत्पन्न किया; अति-लोलुपान्— अत्यन्त कामुक (विषयी); ते—वे; एनम्—ब्रह्माजी; लोलुपतया—कामवश; मैथुनाय—संभोग के लिए; अभिपेदिरे—निकट आये ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी ने अपने नितंब प्रदेश से असुरों को उत्पन्न किया जो अत्यन्त कामी थे। अत्यन्त कामी होने के कारण वे संभोग के लिए उनके निकट आ गये।
 
तात्पर्य
 विषयी जीवन इस भौतिक संसार की आधारभूमि है। यहाँ पर भी यही दुहराया गया है कि असुर विषय-वासना के अत्यन्त प्रेमी होते हैं। जो विषय-वासना से जितना ही मुक्त होता जाता है, वह उतना ही देवत्व के स्तर की ओर अग्रसर होता है और जिसका काम- वासना के प्रति जितना झुकाव होता है, वह उतना ही आसुरी जीवन की अधोगति को प्राप्त होता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥