श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
तां क्‍वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम् ।
काञ्चीकलापविलसद्दुकूलच्छन्नरोधसम् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उस शरीर को; क्वणत्—नुपुर ध्वनि करता; चरण-अम्भोजाम्—चरणकमल वाली; मद—नशा; विह्वल— विभोर; लोचनाम्—आँखों वाली; काञ्ची-कलाप—स्वर्णाभरण से निर्मित करधनी वाली; विलसत्—चमकती; दुकूल—महीन वस्त्र से; छन्न—ढकी; रोधसम्—कटि वाली ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा द्वारा परित्यक्त शरीर ने सन्ध्या का रूप धारण कर लिया जो काम को जगाने वाली दिन-रात की संधि वेला है। असुर जो स्वभाव से कामुक होते हैं और जिनमें रजोगुण का प्राधान्य होता है उसे सुन्दरी मान बैठे जिसके चरण-कमलों से नूपुरों की ध्वनि निकल रही थी, जिसके नेत्र मद से विस्तीर्ण थे और जिसका कटि भाग महीन वस्त्र से ढका था और जिस पर मेखला चमक रही थी।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार प्रात:काल आत्मचिन्तन की वेला है उसी प्रकार संध्या काम (विषय वासना) की वेला है। आसुरी पुरुष प्राय: विषय-सुख के लिए लालायित रहते हैं, अत: संध्या का आना उन्हें प्रीतिकर लगता है। संध्या आगमन को असुरगण ने एक सुन्दरी स्त्री मान लिया और वे उसे कई प्रकार से चाहने लगे। उन्होंने उस संध्या को एक सुन्दरी मान लिया जिसके पाँव के नूपुर से रुनझुन हो रही थी, जिसके कटि प्रदेश में मेखली थी, सुन्दर-सुन्दर उरोज थे और अपनी कामतुष्टि के लिए उन्हें इस सुन्दरी बाला को अपने समक्ष प्रकट होने का आयास हुआ।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥