श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
अन्योन्यश्लेषयोत्तुङ्गनिरन्तरपयोधराम् ।
सुनासां सुद्विजां स्‍निग्धहासलीलावलोकनाम् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
अन्योन्य—परस्पर; श्लेषया—चिपकने से; उत्तुङ्ग—उठे हुए; निरन्तर—अन्तर हीन (सटे); पय:-धराम्—स्तन; सु नासाम्—सुन्दर नाक; सु-द्विजाम्—सुन्दर दाँत; स्निग्ध—आकर्षक; हास—हँसी; लीला-अवलोकनाम्—विलासमयी चितवन ।.
 
अनुवाद
 
 एक दूसरे से सटे होने के कारण उसके स्तन ऊपर उठे हुए थे और उनके बीच में कोई रिक्त स्थान बचा न था। उसकी नाक तथा दाँतों की बनावट सुन्दर थी; उसके होठों पर आकर्षक हँसी नाच रही थी और वह असुरों को क्रीड़ापूर्ण चितवन से देख रही थी।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥