श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
गूहन्तीं व्रीडयात्मानं नीलालकवरूथिनीम् ।
उपलभ्यासुरा धर्म सर्वे सम्मुमुहु: स्त्रियम् ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
गूहन्तीम्—छिपाते हुए; व्रीडया—लज्जावश; आत्मानम्—अपने आपको; नील—काले; अलक—बाल; वरूथिनीम्—गुच्छा; उपलभ्य—कल्पना करके; असुरा:—असुरगण; धर्म—हे विदुर; सर्वे—सभी; सम्मुमुहु:— मोहित हो गये; स्त्रियम्—स्त्री को ।.
 
अनुवाद
 
 काले-काले बालसमूह से विभूषित वह मानो लज्जावश अपने को छिपा रही थी। उस बाला को देखकर सभी असुर विषय-वासना की भूख से मोहित हो गये।
 
तात्पर्य
 असुरों तथा देवताओं में यही अन्तर है कि सुन्दर स्त्री असुरों के मन को आकृष्ट कर लेती है, किन्तु वह दैव-पुरुषों के मन को आकृष्ट नहीं कर पाती। दैव-पुरुष ज्ञान से पूर्ण होता है जब कि असुर अविद्या से। जिस प्रकार कोई शिशु किसी सुन्दर गुडिय़ा के द्वारा आकृष्ट हो उठता है उसी प्रकार से एक असुर कम बुद्धिमान होने तथा अविद्या से पूर्ण होने के कारण भौतिक सुन्दरता से तथा विषय-भोग की भूख से आकृष्ट होता है। दैव-पुरुष जानता है कि सुघड़ वेशभूषा और उन्नत उरोज, उठे नितम्ब, सुन्दर नासिका तथा सुन्दर रूप-रंग का यह आकर्षण माया है। स्त्री में प्रदर्शित होने वाली सारी सुन्दरता रक्त तथा मांस के संयोग से बनी है। श्रीशंकराचार्य ने ऐसे समस्त पुरुषों को रक्त तथा मांस के इस संयोग के प्रति नहीं वरन् आध्यात्मिक-जीवन के वास्तविक सौन्दर्य के प्रति आकृष्ट होने का उपदेश दिया है। वास्तविक सौन्दर्य तो कृष्ण तथा राधा हैं। जो मनुष्य इनके सौन्दर्य से आकृष्ट हो चुका है, वह भौतिक जगत के मिथ्या सौन्दर्य से आकृष्ट नहीं हो सकता। एक असुर तथा दैव पुरुष अथवा भक्त में यही अन्तर होता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥