श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 37

 
श्लोक
इति सायन्तनीं सन्ध्यामसुरा: प्रमदायतीम् ।
प्रलोभयन्तीं जगृहुर्मत्वा मूढधिय: स्त्रियम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार से; सायन्तनीम्—सायंकाल; सन्ध्याम्—सन्ध्या का प्रकाश; असुरा:—असुरगण; प्रमदायतीम्— गर्वीली स्त्री की भाँति आचरण करती; प्रलोभयन्तीम्—लुभाती हुई; जगृहु:—पकड़ लिया; मत्वा—मानकर; मूढ धिय:—मूर्ख; स्त्रियम्—स्त्री को ।.
 
अनुवाद
 
 जिनकी बुद्धि पर पर्दा पड़ चुका है, ऐसे असुरों ने सन्ध्या को हावभाव करने वाली आकर्षक सुन्दरी मानकर उसको पकड़ लिया।
 
तात्पर्य
 असुरों को मूढ-धिय: कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे गधों की तरह जड़तावश मोहित हो गये। असुर
लोग मिथ्या, भौतिक रूप की प्रदीप्त सुन्दरता पर मोहित हो गये और उसका आलिंगन करने लगे।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥