श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
सृष्ट्वा भूतपिशाचांश्च भगवानात्मतन्द्रिणा ।
दिग्वाससो मुक्तकेशान् वीक्ष्य चामीलयद् द‍ृशौ ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
सृष्ट्वा—उत्पन्न करके; भूत—भूत-प्रेत; पिशाचान्—पिशाचों को; च—तथा; भगवान्—ब्रह्माजी ने; आत्म—अपने; तन्द्रिणा—आलस्य से; दिक्-वासस:—नग्न; मुक्त—बिखरे; केशान्—बालों को; वीक्ष्य—देखकर; च—तथा; अमीलयत्—बन्द किया; दृशौ—दोनों नेत्र ।.
 
अनुवाद
 
 तब पूज्य ब्रह्मा ने अपनी तन्द्रा से भूतों तथा पिशाचों को उत्पन्न किया, किन्तु जब उन्हें नग्न एवं बिखरे बाल वाले देखा तो उन्होंने अपनी आँखें बन्द कर लीं।
 
तात्पर्य
 भूत तथा प्रेत भी ब्रह्मा की सृष्टि हैं, वे अवास्तविक नहीं हैं। ये सब बद्धजीव को नाना प्रकार के कष्टों में डालने के साधन हैं। इनकी सृष्टि परमेश्वर के आदेश से ब्रह्मा द्वारा की गई समझी जाती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥