श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
ते तु तज्जगृहू रूपं त्यक्तं यत्परमेष्ठिना ।
मिथुनीभूय गायन्तस्तमेवोषसि कर्मभि: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
ते—उन्होंने (किन्नर तथा किम्पुरुष); तु—लेकिन; तत्—वह; जगृहु:—अपना लिया; रूपम्—उस छाया रूप को; त्यक्तम्—परित्यक्त; यत्—जो; परमेष्ठिना—ब्रह्मा द्वारा; मिथुनी-भूय—पत्नियों सहित; गायन्त:—स्तुति; तम्— उसको; एव—केवल; उषसि—उषाकाल में; कर्मभि:—अपने कर्म के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 किम्पुरुषों तथा किन्नरों ने ब्रह्मा द्वारा त्यक्त उस छाया-शरीर को ग्रहण कर लिया इसीलिए वे अपनी पत्नियों सहित प्रत्येक प्रात:काल उनके कर्म का स्मरण कर करके उनकी प्रशंसा का गान करते हैं।
 
तात्पर्य
 सूर्योदय के डेढ़ घंटे पहले प्रात:काल को ब्राह्म-मुहूर्त कहा जाता है। इस ब्राह्म- मुहूर्त में आध्यात्मिक कर्म किये जाते हैं। इस वेला (काल) में सम्पन्न क्रियाएँ दिन के अन्य भाग में सम्पन्न क्रियाओं से अधिक प्रभावात्मक होती हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥