श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक
देहेन वै भोगवता शयानो बहुचिन्तया ।
सर्गेऽनुपचिते क्रोधादुत्ससर्ज ह तद्वपु: ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
देहेन—शरीर से; वै—निस्सन्देह; भोगवता—पूरा फैलकर; शयान:—शयन करते हुए; बहु—अधिक; चिन्तया— चिन्ता से; सर्गे—सृष्टि; अनुपचिते—बढ़ती न देखकर; क्रोधात्—क्रोधवश; उत्ससर्ज—त्याग दिया; ह—निस्सन्देह; तत्—वह; वपु:—शरीर ।.
 
अनुवाद
 
 एक बार ब्रह्माजी अपने शरीर को पूरी तरह फैलाकर लेटे थे। वे अत्यधिक चिन्तित थे कि उनकी सृष्टि का कार्य आगे नहीं बढ़ रहा है, अत: उन्होंने रोष में आकर उस शरीर को भी त्याग दिया।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥