श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक
येऽहीयन्तामुत: केशा अहयस्तेऽङ्ग जज्ञिरे ।
सर्पा: प्रसर्पत: क्रूरा नागा भोगोरुकन्धरा: ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो; अहीयन्त—गिर गये; अमुत:—उससे; केशा:—बाल; अहय:—सर्प; ते—वे; अङ्ग—हे विदुर; जज्ञिरे—के रूप में जन्म लिया; सर्पा:—साँप; प्रसर्पत:—रेंगने वाले शरीर से; क्रूरा:—ईर्ष्यालु; नागा:—काले साँप; भोग—फनों से; उरु—विशाल; कन्धरा:—जिनके कंधे ।.
 
अनुवाद
 
 हे विदुर, उस शरीर से जो बाल गिरे वे सर्पों में परिणत हो गये। उनके हाथ-पैर सिकोड़ कर चलने से उस शरीर से क्रूर सर्प तथा नाग उत्पन्न हुए जिनके फन फैले हुए होते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥