श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 49

 
श्लोक
स आत्मान् मन्यमान: कृतकृत्यमिवात्मभू: ।
तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
स:—ब्रह्मा ने; आत्मानम्—अपने आपको; मन्यमान:—मानकर; कृत-कृत्यम्—जीवन उद्देश्य को प्राप्त, धन्य; इव— मानो; आत्मभू:—परमेश्वर से उत्पन्न; तदा—तब; मनून्—सभी मनुओं को; ससर्ज—उत्पन्न किया; अन्ते—अन्त में; मनसा—अपने मन से; लोक—संसार का; भावनान्—कल्याणकारी ।.
 
अनुवाद
 
 एक दिन स्वयंजन्मा प्रथम जीवात्मा ब्रह्मा ने अनुभव किया कि उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लिया है। उस समय उन्होंने अपने मन से मनुओं को उत्पन्न किया, जो ब्रह्माण्ड के कल्याण-कार्यों की वृद्धि करने वाले हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥