श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
ता न: कीर्तय भद्रं ते कीर्तन्योदारकर्मण: ।
रसज्ञ: को नु तृप्येत हरिलीलामृतं पिबन् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
ता:—उनकी वार्ता; न:—हमको; कीर्तय—सुनाइये; भद्रम् ते—आपका मंगल हो; कीर्तन्य—जपना चाहिए; उदार— उदार; कर्मण:—कार्य; रस-ज्ञ:—भक्त जो रस को समझ सके, रसिक; क:—कौन; नु—निस्सन्देह; तृप्येत—तृप्ति का अनुभव करे; हरि-लीला-अमृतम्—भगवान् की लीलाओं का अमृत; पिबन्—पीते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 हे सूत गोस्वामी, आपका मंगल हो, कृपा करके भगवान् के कार्यों को कह सुनाइये क्योंकि वे उदार एवं स्तुति के योग्य हैं। ऐसा कौन भक्त है, जो भगवान् की अमृतमयी लीलाओं को सुनकर तृप्त हो जाये?
 
तात्पर्य
 भगवान् की लीलाओं का आख्यान भक्तों द्वारा अत्यन्त आदरपूर्वक सुना जाना चाहिए क्योंकि वे लीलाएँ सदैव दिव्य पद पर घटित होती हैं। जो वास्तव में दिव्य धरातल पर स्थित हैं, वे भगवान् की लीलाओं की कथा सुनते हुए कभी नहीं अघाते। उदाहरणार्थ, यदि कोई सिद्ध पुरुष भगवद्गीता पढ़ता है, तो वह कभी तृप्त नहीं होता। भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत की कथाओं को हजार-हजार बार पढ़ लेने पर भी भक्तों को उनकी नई-नई बातों में निश्चित रूप से आनन्द मिलता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥