श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
विदुर उवाच
स्वायम्भुवस्य च मनोर्वंश: परमसम्मत: ।
कथ्यतां भगवन् यत्र मैथुनेनैधिरे प्रजा: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
विदुर: उवाच—विदुर ने कहा; स्वायम्भुवस्य—स्वायम्भुव का; च—तथा; मनो:—मनु का; वंश:—वंश; परम— सर्वाधिक; सम्मत:—आदरणीय; कथ्यताम्—कृपया कहिये; भगवन्—हे पूज्य ऋषि; यत्र—जिसमें; मैथुनेन— संभोग से; एधिरे—वृद्धि की; प्रजा:—सन्तति ने ।.
 
अनुवाद
 
 विदुर ने कहा—स्वायम्भुव मनु की वंश परम्परा अत्यन्त आदरणीय थी। हे पूज्य ऋषि, मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप इस वंश का वर्णन करें जिसकी सन्तति-वृद्धि संभोग के द्वारा हुई।
 
तात्पर्य
 अच्छी सन्तान उत्पन्न करने के लिए नियंत्रित विषयी जीवन अपनाना चाहिए। वास्तव में विदुर ऐसे व्यक्तियों का इतिहास सुनने के लिए इच्छुक नहीं थे, जो विषयी जीवन बिता रहे हों; वे तो स्वायंभुव मनु की सन्तति के विषय में जानना चाहते थे, क्योंकि इस वंश में अनेक भक्त राजा हुए हैं, जिन्होंने अपनी प्रजा का पालन आत्मज्ञान के साथ एवं अत्यन्त सावधानीपूर्वक किया था। अत: उनके कार्यकलापों का इतिहास सुनकर मनुष्य अधिक प्रबुद्ध बन सकता है। इस प्रसंग में एक महत्त्वपूर्ण शब्द परम-सम्मत आया है, जिससे संकेत मिलता है कि स्वायंभुव मनु तथा उनके पुत्रों की संतति बड़े-बड़े अधिकारियों को स्वीकार्य थी। दूसरे शब्दों में, आदर्श सन्तान उत्पन्न करने के लिए विषयी जीवन की मान्यता सभी ऋषि तथा वैदिक धर्म ग्रंथों के अधिकारी देते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥