श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
विन्यस्तचरणाम्भोजमंसदेशे गरुत्मत: ।
दृष्ट्वा खेऽवस्थितं वक्ष:श्रियं कौस्तुभकन्धरम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
विन्यस्त—रखे हुए; चरण-अम्भोजम्—चरणकमल; अंस-देशे—कंधों पर; गरुत्मत:—गरुड़ के; दृष्ट्वा—देखकर; खे—आकाश में; अवस्थितम्—खड़े हुए; वक्ष:—अपनी छाती पर; श्रियम्—शुभ चिह्न (श्रीवत्स); कौस्तुभ— कौस्तुभमणि; कन्धरम्—गले में ।.
 
अनुवाद
 
 अपने वक्षस्थल पर सुनहरी रेखा धारण किये तथा अपने गले में प्रसिद्ध कौस्तुभमणि लटकाये हुए वे गरुड़ के कन्धों पर अपने चरण-कमल रखे हुए आकाश (वायु) में खड़े थे।
 
तात्पर्य
 श्लोक ९-११ में भगवान् के जिस दिव्य, नित्य रूप का वर्णन किया गया है, वह प्रामाणिक वैदिक विवरणों से है। ये विवरण निश्चय ही कर्दम मुनि की कल्पनाएँ नहीं हैं। भगवान् के अलंकरण भौतिक बुद्धि के परे (अगम्य) हैं जिसको शंकराचार्य जैसे निर्विशेषवादियों ने भी स्वीकार किया है कि श्रीभगवान् के विविध रूप—उनका शरीर, उनका रूप, उनका वस्त्र, उनका उपदेश, उनके वचन—ये किसी भौतिक शक्ति की उपज नहीं हैं वरन् इनकी पुष्टि वैदिक साहित्य द्वारा हुई है। भगवान् नारायण को भौतिक सृष्टि से कुछ लेना देना नहीं है। योग-साधना के द्वारा कर्दम मुनि वास्तव में देख सके कि भगवान् क्या हैं। दस हजार वर्षों तक योगाभ्यास के बाद भगवान् के काल्पनिक रूप का दर्शन करना कोई अर्थ नहीं रखता। अत: योग की सिद्धि का अन्त शून्यता या निर्विशेषता में नहीं है, बल्कि इसके विपरीत जब कोई वास्तव में भगवान् को उसके नित्य रूप में देखता है, तो योग की सिद्धि प्राप्त होती है। श्रीकृष्णभावनामृत की पद्धति में श्रीकृष्ण के स्वरूप को प्रत्यक्ष प्रस्तुत किया जाता है। वैदिक साहित्य ब्रह्म-संहिता में कृष्ण का स्वरूप प्रामाणिक रूप में मिलता है—उनका धाम चिन्तामणि पत्थर का बना है, जिसमें भगवान् एक गोपबाल के रूप में खेलते हैं और हजारों गोपियाँ उनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। ये वर्णन प्रामाणिक हैं और कृष्णभावनाभावित पुरुष इनको प्रत्यक्ष रूप में ग्रहण करता है, उन्हीं के अनुसार कार्य करता है, उनका उपदेश देता है और अधिकृत शास्त्रों में वर्णन किए गए ढंग से भक्तियोग का अभ्यास करता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥