श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
ये मायया ते हतमेधसस्त्वत्-
पादारविन्दं भवसिन्धुपोतम् ।
उपासते कामलवाय तेषां
रासीश कामान्निरयेऽपि ये स्यु: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो व्यक्ति; मायया—छलने वाली शक्ति से; ते—तुम्हारा; हत—भ्रष्ट; मेधस:—जिनकी बुद्धि; त्वत्—तुम्हारा; पाद-अरविन्दम्—चरणकमल; भव—संसार का; सिन्धु—सागर; पोतम्—पार करने की नाव; उपासते—पूजा करते हैं; काम-लवाय—क्षुद्र सुखों के लिए; तेषाम्—उनकी; रासि—देते हो; ईश—हे ईश्वर; कामान्—इच्छाएँ; निरये— नरक में; अपि—भी; ये—जो इच्छा करते हैं; स्यु:—प्राप्त हो सकती हैं ।.
 
अनुवाद
 
 आपके चरण-कमल सांसारिक अज्ञान के सागर को पार करने के लिए सच्चे पोत (नाव) के तुल्य हैं। माया के वशीभूत केवल अज्ञानी पुरुष ही इन चरणों की पूजा इन्द्रियों के क्षुद्र तथा क्षणिक सुख की प्राप्ति हेतु करते हैं जिनकी प्राप्ति नरक में सडऩे वाले व्यक्ति भी कर सकते हैं। तो भी, हे भगवान्, आप इतने दयालु हैं कि उन पर भी आप अनुग्रह करते हैं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता के सप्तम अध्याय में कहा गया है, भक्तों की दो कोटियाँ हैं—पहले वे जो भौतिक सुख चाहते हैं और दूसरे वे जो ईश्वर की सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोचते। भौतिक सुख तो कूकर तथा शूकर भी प्राप्त कर सकते हैं जिनका जीवन अत्यन्त नारकीय होता है। शूकर भी खाता, सोता और संभोग का पूरा आनन्द उठाता है और इस संसार के ऐसे नारकीय सुख से अत्यन्त प्रसन्न रहता है। आधुनिक योगी उपदेश देता है कि चूँकि मनुष्य के इन्द्रियाँ हैं, अत: उसे भी कुत्ते तथा बिल्लियों की भाँति उनका पूरा उपयोग करना चाहिए और साथ ही योग का अभ्यास भी करना चाहिए। यहाँ पर कर्दम मुनि ने इसकी निन्दा की है। वे कहते हैं कि ऐसे भौतिक सुख नारकीय जीवन बिताने वाले कुत्तों तथा बिल्लियों के लिए हैं। भगवान् इतने दयालु हैं कि यदि तथाकथित योगी इन नारकीय सुखों से तृप्त हो जाते हैं, तो वे उन्हें उन समस्त भौतिक सुखों को इच्छानुसार प्राप्त करने की छूट देते हैं, किन्तु उन्हें कर्दम मुनि के समान सिद्ध अवस्था नहीं मिल सकती।

वास्तविकता तो यह है कि नारकीय तथा आसुरी लोग यह जानते ही नहीं कि सिद्धि का परम साध्य क्या है, फलत: वे इन्द्रियतृप्ति को ही जीवन का उच्चतम लक्ष्य मान बैठते हैं। वे यह उपदेश देने लगते हैं कि इन्द्रियतृप्ति के साथ ही वे कुछ मन्त्र सुनाकर और कुछ आसन करके सिद्धि की कामना कर सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को यहाँ पर हत-मेधस: कहा गया है, अर्थात् “जिनके दिमाग खराब हो चुके हैं।” ऐसे लोग योगसिद्धि या ध्यान के द्वारा भौतिक सुख की कामना करते हैं। भगवान् ने भगवद्गीता में कहा है कि जो देवताओं की पूजा करते हैं उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी होती है। इसी प्रकार यहाँ भी कर्दम मुनि कहते हैं कि जो योगाभ्यास के द्वारा भौतिक सुख की कामना करता है, समझ लो, उसकी बुद्धि बिगड़ चुकी है और वह महामूर्ख है। वस्ततु: योग के उत्तम अभ्यासकर्ता को श्रीभगवान् की पूजा करके अज्ञान के सागर को पार करने और भगवान् के चरणकमलों के दर्शन प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई भी कामना नहीं करनी चाहिए। किन्तु ईश्वर ऐसे दयालु हैं कि ऐसे बुद्धिभ्रष्ट लोगों को वे आज भी कुत्ता, बिल्ली, शूकर बनाकर सम्भोग तथा इन्द्रियतृप्ति द्वारा सुख उठाने का वर देते हैं। भगवद्गीता में भगवान् ने इस वरदान की पुष्टि की है, “जब भी कोई मनुष्य मुझसे कुछ प्राप्त करना चाहता है, तो मैं उसको मनवांछित वर देता हूँ।”

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥