श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
प्रजापतेस्ते वचसाधीश तन्त्या
लोक: किलायं कामहतोऽनुबद्ध: ।
अहं च लोकानुगतो वहामि
बलिं च शुक्लानिमिषाय तुभ्यम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
प्रजापते:—जो समस्त जीवात्माओं के स्वामी हैं; ते—तुम्हारे; वचसा—निर्देश से; अधीश—हे भगवान्; तन्त्या—डोरी से; लोक:—बद्धजीव; किल—निस्सन्देह; अयम्—ये; काम-हत:—काम वासनाओं से विजित; अनुबद्ध:—बँधे हुए; अहम्—मैं; च—तथा; लोक-अनुगत:—बद्धजीवों का अनुसरण करता; वहामि—प्रदान करता हूँ; बलिम्— बलि, भेंट; च—तथा; शुक्ल—हे धर्मरूप; अनिमिषाय—शाश्वत समय के रूप में रहकर; तुभ्यम्—तुम्हें ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप समस्त जीवात्माओं के स्वामी तथा नायक हैं। आपके आदेश से सभी बद्धजीव मानो डोरी से बँधकर अपनी-अपनी इच्छाओं की तुष्टि में निरन्तर लगे रहते हैं। उन्हीं का अनुसरण करते हुए, हे धर्ममूर्ते, शाश्वत काल रूप आपको मैं भी अपनी आहुति (बलि) अर्पण करता हूँ।
 
तात्पर्य
 कठ उपनिषद् में कहा गया है कि परमेश्वर समस्त जीवात्माओं के नायक हैं। वे उनके पालक और समस्त आवश्यकताओं तथा इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं। कोई भी जीवात्मा स्वतन्त्र नहीं है, सभी परमेश्वर की कृपा पर आश्रित हैं। अत: वेदों का आदेश है कि परम नायक परमेश्वर के निर्देशानुसार जीवन का उपभोग किया जाय। ईशोपनिषद का आदेश है कि प्रत्येक वस्तु श्रीभगवान् की है, अत: मनुष्य को चाहिए कि वह व्यक्तिगत प्राप्तव्य का भोग करे, किसी अन्य की सम्पत्ति में घुसपैठ न करे। सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम तो यह होगा कि प्रत्येक जीवात्मा परम पुरुष से आदेश ले कर भौतिक या आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करे।

यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि जब कर्दम मुनि आध्यात्मिक जीवन में इतना आगे बढ़े हुए थे तो फिर उन्होंने मुक्ति की याचना क्यों नहीं की? परमेश्वर को समक्ष देखकर और अनुभव करके वे भौतिक जीवन का सुख भोगना क्यों चाह रहे थे? इसका उत्तर यह है कि प्रत्येक प्राणी भौतिक बन्धन से मुक्त होने में कुशल नहीं है। अत: यह प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसार भोग करे, किन्तु वेदों या भगवान् के निर्देशानुसार करे। वेद भगवान् के प्रत्यक्ष वचन हैं। भगवान् हमें अवसर देते हैं कि हम अपनी इच्छानुसार भौतिक जीवन को भोगें, किन्तु उसके साथ ही वे वेदों से बँधे हुए चलने का निर्देश भी करते हैं जिससे धीरे-धीरे भौतिक बन्धन से मुक्ति तक उठा जा सके। जो बद्धजीव इस संसार में प्रकृति के ऊपर अपना अधिकार जता कर अपनी इच्छाओं को पूरा करने आये हैं, वे प्रकृति के नियमों से बँधे हुए हैं। सर्वोत्तम मार्ग यही है कि वैदिक नियमों का पालन किया जाय। इससे मुक्ति-प्राप्ति में क्रमश: सहायता मिलेगी।

कर्दम मुनि भगवान् को शुक्ल कहकर सम्बोधित करते हैं जिसका अर्थ है, “धर्म का नायक।” जो पवित्र हैं उन्हें चाहिए कि वे धर्म के नियमों का पालन करें, क्योंकि ऐसे नियम भगवान् ने स्वयं बनाये हैं। कोई भी धर्म को बना नहीं सकता। ‘धर्म’ का अर्थ ही है भगवान् के आदेश या नियम। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि धर्म का अर्थ है, उनके शरणागत होना। अत: मनुष्य को चाहिए कि वैदिक नियमों का पालन करे और परमेश्वर को आत्मसमर्पण कर दे, क्योंकि मनुष्य जीवन में सिद्धि का परम लक्ष्य यही है। मनुष्य को पवित्रता का जीवन बिताना चाहिए, धार्मिक विधि-विधानों का पालन करना चाहिए, ब्याह करना चाहिए और आत्म-बोध के उच्च पद को प्राप्त करने के लिए शान्तिपूर्वक रहना चाहिए।

 
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